पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भोजन करनेसे जैसे सब इन्द्रिय ( समर्थ होती हैं ) इसीप्रकार सम्पूर्ण कार्य धनसे ( होते हैं ), इस कारणसे धन सबका साधन कहा जाता है ॥ ८ ॥
अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ।
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥ ९ ॥
धनकी इच्छासे यह प्राणी श्मशानकोभी सेवन करता है, निर्धन अपने उत्पन्न करनेवालेको भी छोडकर दूर जाता है ॥ ९ ॥
गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः ।
अर्थेन तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥ १० ॥
वृद्ध पुरुषोंमेभी जिनके धन हैं वे तरुण हैं, जो धनसे हीन हैं, वे युवा अवस्थामें ही वृद्ध होते हैं ॥ १० ॥
स चार्थः पुरुषाणां षड्भिरुपायैर्भवति भिक्षया, नृपसेवया, कृषिकर्मणा, विद्योपार्जनेन, व्यवहारेण, वणिक्कर्मणा वा । सर्वेषामपि तेषां वाणिज्येन अतिरस्कृतोऽर्थलाभः स्यात् । उक्तञ्च यतः—
वह धन पुरुषोंको छः उपायोंसे मिलता है, भिक्षा, राजसेवा, खेतीका कार्य, विद्याउपार्जन, लेनदेन वा वणिक्कर्मसे । इन सबमें वाणिज्यसे सर्वसम्मत लाभ होता है।
कृता भिक्षाऽनेकैर्वितरति नृपो नोचितमहो
कृषिः क्लिष्टा विद्या गुरुविनयवृत्त्यातिविषमा ।
कुसीदाद्दारिद्र्यं परकरगतग्रन्थिशमना-
न्न मन्ये वाणिज्यात्किमपि परमं वर्त्तनमिह ॥ ११ ॥
अनेक पुरुषोंने भिक्षा की है, राजाभी योग्य वृत्ति नहीं देता है, खेती क्लेशदायिनी है, विद्या गुरुकी विनयवृत्तिसे अति विषम है, व्याजसे भी दरिद्र होता है, कारण कि, दूसरेके ¹हाथमे आनेसे ग्रन्थिशमन हो जाय, वाणिज्यसे अधिक कोईभी जीवनोपाय नहीं मानताहूं । शिखरिणी छन्द है ॥ ११ ॥
उपायानाञ्च सर्वेषामुपायः पण्यसंग्रहः ।
धनार्थं शस्यते ह्येकस्तदन्यः संशयात्मकः ॥ १२ ॥
१ कोई धरोहर मारले ।