भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( २१७ )

अथवा मैं गुणवान्हूं मुझको वैर यातना कुछ नहीं करेगी यह सम्भावना न करनी । कहाहै—

सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिनेः मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम् । छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिंगलम् अज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः ॥३६॥”

सिंहने व्याकरणके निर्माता पाणिनीके प्रिय प्राणोंको नष्ट किया और मीमांसाके बनानेवाले जैमिनि मुनिको सहसा हाथीने मार डाला और छन्दःशास्त्रके ज्ञाता पिंगलक ऋषिको सागरके किनारे नाकेने निगल लिया, अज्ञानसे आवृतचित्त अति क्रोधी कीटादिको गुणोंसे क्या प्रयोजन है ॥ ३६ ॥”

वायस आह,—“अस्त्येतत तथापि श्रूयताम् । काक बोला,—यह तो योंही है तथापि सुनो—

उपकाराच्च लोकानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां मैत्री स्याद्दर्शनात्सताम् ॥ ३७ ॥

उपकारसे लोकोंकी निमित्तसे मृगपक्षियोंकी, भय और लोभसे मूर्खोंकी और दर्शन करतेही सत्पुरुषोंकी मित्रता होतीहै ॥ ३७ ॥

मृद्धट इव सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति । सुजनस्तु कनकघट इव दुर्भेद्यः सुकरसन्धिश्च ॥ ३८ ॥

मट्टीके घटकी समान सुखसे तोडने योग्य और फिर जुडनेके अयोग्य दुर्जन होता है सुजन सोनेके घडेकी समान दुर्भेद्य और शीघ्र जुड जानेवाला होता है ॥ ३८ ॥

इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि यथा रसविशेषः । तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानान्तु विपरीता ॥ ३९ ॥

ईखके अग्रभागमें क्रमसे जैसे रसविशेष होता जाता है इसी प्रकार सुजनोंकी मित्रता होती है दुर्जनोंकी इसके विपरीत होती है ॥ ३९ ॥

तथाच— तैसेही—

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् ।