भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( २६५ )

तत् किं वृथा श्रमाय मां नियोजयसि । अत्रस्थः तावज्जला- र्थमागतान् मूषकान् भक्षयिष्यामि समं त्वया मार्गोऽयं यतः तेषाम् । अपरं यदि त्वां मुक्त्वा अस्य तीक्ष्णविषाणस्य वृष- भस्य पृष्ठे गमिष्यामि तदा आगत्य अन्यः कश्चिदेतत् स्थानं समाश्रयिष्यति । न एतत् युज्यते कर्तुम् । उक्तञ्च-

किसी एक स्थानमें तीक्ष्ण शृंगनामवाला बैल रहता था वह मदकी अधि- कतासे अपने यूथको त्यागने किये शृंगोंसे नदीतटको विदीर्ण करता हुआ अपनी इच्छासे मरकतमणीकी समान घास खाता वनचारी भया । उसी वनमें प्रलोभक नाम शृगाल रहता था । वह कभी अपनी भार्याके सहित नदीके किनारे सुखसे बैठाथा, इसी समय तीक्ष्णशृंग जलपानके निमित्त नदीके तटपर आया । तब उसके लम्बायमान अण्डकोष देखकर शृगालीने शृगालसे कहा,- "स्वामिन् ! इस वृषभके मासपिण्ड लम्बायमान होते हुए देखो । सो यह एकही क्षणसे अथवा प्रहारसे गिर जायगे । ऐसा विचार कर तुम इसके पीछे फिरो" । शृगाल बोला- "प्रिये ! नहीं जाना जाता कि, कब इन दोनोंका पतन होगा वा नहीं । सो क्यों वृथा श्रममें मुझको नियुक्त करती है । यहीं पर स्थित हुआ जलपानके निमित्त आये हुए मूपकोंको तेरे साथ भक्षण करूंगा कारण कि, यह उनका मार्ग है । और यदि तुझको छोड़कर इस तीक्ष्णशृंगवाले वृषके पीछे जाऊंगा तो, आनकर और कोई इस स्थानको ग्रहण कर लेगा, सो यह करना उचित नहीं । कहा है-

यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ॥ १४७ ॥”

जो विद्यमानको छोड़कर अविद्यमानका सेवन करता है उसके ध्रुव कार्य नष्ट होते हैं और अध्रुव नष्ट हैं हीं ॥ १४७ ॥”

शृगाली आह-“भोः कापुरुषस्त्वं यत्किञ्चित् प्राप्तं तेनापि सन्तोषं करोषि । उक्तञ्च-

शृगाली बोली,-“भो ! कापुरुष (डरपोक) तू जो कुछ प्राप्त हुआ है उसीसे सन्तोष करता है । कहा है-