पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
पर चढगया । हिरण्यक समीपवर्ती बिलमें प्रविष्ट हुआ । तब यह लुब्धक मृगके गमनसे दुःखीमुख व्यर्थश्रम होनेसे उस मन्थरकको मन्द मन्द स्थलमें जाता देखकर विचारने लगा । "यद्यपि विधाताने हरिणको हरण कर लिया है तथापि यह कूर्म भोजनके निमित्त प्राप्त हुआ है । सो आज इसके मांससे हमारे कुटुम्बकी आहारवृत्ति होगी" । ऐसा विचार उसको कुशोंसे बांधकर धनुषपर आरोपण कर कंधेपर रख घरकी ओरको चला । इसी समय उसको ले जाता हुआ देख हिरण्यक दुःखसे व्याकुल हो विलाप करने लगा । "भो ! बड़ा कष्ट आपदा—
एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं
गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य ।
तावद्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९१ ॥
सागरकी समान जबतक एक दुःखके पारको प्राप्त नहीं होता हूं तबतक दूसरा मुझे उपस्थित हुवाहै विपत्तिमें अनर्थकी प्राप्ती बहुत करके होती है॥१९१॥
तावदस्खलितं यावत्सुखं याति समे पथि ।
स्खलिते च समुत्पन्ने विषमञ्च पदे पदे ॥ १९२ ॥
तभीतक नहीं गिरता है जबतक समान मार्गमें गमन करता है और पतन होनेमें पद पदमें विषम मार्गही उपस्थित होता है ॥ १९२ ॥
यन्नम्रं सरलञ्चापि तच्चापत्सु न सीदति ।
धनुर्मित्रं कलत्रं च दुर्लभं शुद्धवंशजम् ॥ १९३ ॥
जो नम्र और सरल है वह आपत्तिमें भी विकारको प्राप्त नहीं होता है, पवित्र कुल ( शुद्धवंश ) से उत्पन्न धनु, मित्र और स्त्री दुर्लभ हैं ( यह आपदा में भी विकृत नहीं होते ) ॥ १९३ ॥
न मातरि न दारेषु न सौदर्ये न चात्मजे ।
विश्रम्भस्तादृशः पुंसां यादृङ्मित्रे निरन्तरे ॥ १९४ ॥
माता, स्त्री, सगेभाई, पुत्रमें भी पुरुषका ऐसा विश्वास नहीं होता जैसा निरन्तर मित्रमें होता है ॥ १९४ ॥