पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२८४) पञ्चतन्त्रम् ।
घाववाले स्थानमें वारंवार प्रहार पडते हैं, धनक्षय होनेसे जठरानल (भूख) दीप्त हो जाताहै, आपत्तिमें बैर प्रगट होतेहैं, छिद्रमें अनेक अनर्थ होतेहैं॥१९७॥
अहो ! साधु उक्तं केनापि- अहो किसीने अच्छा कहाहै-
प्राप्ते भये परित्राणं प्रीतिविश्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ॥ १९८ ॥"
भय प्राप्तिमें रक्षा, प्रीति विश्रामके पात्र मित्र यह रत्नरूपी दो अक्षर किसने निर्माण कियेहैं ॥ १९८ ॥"
अत्रान्तरे च आक्रन्दपरौ चित्रांगलघुपतनकौ तत्र एव समायातौ । अथ हिरण्यक आह,-"अहो ! किं वृथा प्रलपितेन । तद्यावदेष मन्थरको दृष्टिगोचरात् न नीयते तावदस्य मोक्षोपायश्चिन्त्यताम् । इति ।
इसी समय रुदन करते हुए चित्रांग और लघुपतनक उस स्थानमें आये । तब हिरण्यक बोला-"वृथा रुदन करनेसे क्या है सो जबतक यह मन्थरक दृष्टिके सामनेसे न जाय तबतक इसके छुडानेका उपाय करो ।
व्यसनं प्राप्य यो मोहात्केवलं परिदेवयेत् । क्रन्दनं वर्द्धयत्येव तस्यान्तं नाधिगच्छति ॥ १९९ ॥
जो दुःखको प्राप्त होकर मोहसे केवल रुदनही करताहै उसका रोनाही बढता है वह दुःखके अन्तको प्राप्त नहीं होता ॥ १९९ ॥
केवलं व्यसनस्योक्तं भेषजं नयपण्डितैः । तस्योच्छेदसमारम्भो विषादपरिवर्जनम् ॥ २०० ॥
नीतिमें कुशल पंडितोंने विपत्तिकी एकही मुख्य औषधि कही है उस दुःखके नाश करनेका उपाय करना और विषाद त्यागना ॥ २०० ॥
अन्यच्च- औरभी-
अतीतलाभस्य सुरक्षणार्थं भविष्यलाभस्य च संगमार्थम् ।