भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

(२८४) पञ्चतन्त्रम् ।

घाववाले स्थानमें वारंवार प्रहार पडते हैं, धनक्षय होनेसे जठरानल (भूख) दीप्त हो जाताहै, आपत्तिमें बैर प्रगट होतेहैं, छिद्रमें अनेक अनर्थ होतेहैं॥१९७॥

अहो ! साधु उक्तं केनापि- अहो किसीने अच्छा कहाहै-

प्राप्ते भये परित्राणं प्रीतिविश्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ॥ १९८ ॥"

भय प्राप्तिमें रक्षा, प्रीति विश्रामके पात्र मित्र यह रत्नरूपी दो अक्षर किसने निर्माण कियेहैं ॥ १९८ ॥"

अत्रान्तरे च आक्रन्दपरौ चित्रांगलघुपतनकौ तत्र एव समायातौ । अथ हिरण्यक आह,-"अहो ! किं वृथा प्रलपितेन । तद्यावदेष मन्थरको दृष्टिगोचरात् न नीयते तावदस्य मोक्षोपायश्चिन्त्यताम् । इति ।

इसी समय रुदन करते हुए चित्रांग और लघुपतनक उस स्थानमें आये । तब हिरण्यक बोला-"वृथा रुदन करनेसे क्या है सो जबतक यह मन्थरक दृष्टिके सामनेसे न जाय तबतक इसके छुडानेका उपाय करो ।

व्यसनं प्राप्य यो मोहात्केवलं परिदेवयेत् । क्रन्दनं वर्द्धयत्येव तस्यान्तं नाधिगच्छति ॥ १९९ ॥

जो दुःखको प्राप्त होकर मोहसे केवल रुदनही करताहै उसका रोनाही बढता है वह दुःखके अन्तको प्राप्त नहीं होता ॥ १९९ ॥

केवलं व्यसनस्योक्तं भेषजं नयपण्डितैः । तस्योच्छेदसमारम्भो विषादपरिवर्जनम् ॥ २०० ॥

नीतिमें कुशल पंडितोंने विपत्तिकी एकही मुख्य औषधि कही है उस दुःखके नाश करनेका उपाय करना और विषाद त्यागना ॥ २०० ॥

अन्यच्च- औरभी-

अतीतलाभस्य सुरक्षणार्थं भविष्यलाभस्य च संगमार्थम् ।