भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (२९१)

बलवान् शत्रुको प्रणामसे सान्त्वना करनेवाले तथा समयपर प्रहार करनेवाले मनुष्योंकी सम्पत्ति निम्नवाहिनी नदीकी समान प्रतिकूल होकरभी नष्ट नहीं होतीहै ॥ ७ ॥

तथाच—
तैसेही—

सन्त्याज्यो धार्मिकश्चार्यो भ्रातृसंघातवान्बली ।
अनेकविजयी चैव सन्धेयः स रिपुर्भवेत् ॥ ८ ॥

धर्मात्मा श्रेष्ठ बहुत भाइयोंसे युक्त बली बहुतसे संग्रामका जीतनेवाला शत्रु त्यागना चाहिये अर्थात् उससे विग्रह न करे ॥ ८ ॥

सन्धिः कार्योऽप्यनार्येण विज्ञाय प्राणसंशयम् ।
प्राणैः संरक्षितैः सर्वं यतो भवति रक्षितम् ॥ ९ ॥

प्राणसंशय प्राप्त होनेपर अनार्यके साथभी संधि करना उचित है क्योंकि प्राणरक्षासे सबकी रक्षा होती है ॥ ९ ॥

येन अनेकयुद्धविजयी स तेन विशेषात् सन्दधनीयः ।

उक्तञ्च—
जिससे कि वह अनेक युद्ध विजयी है इस कारण उससे संधि करलो । कहाहै कि—

अनेकयुद्धविजयी सन्धानं यस्य गच्छति ।
तत्प्रभावेण तस्याशु वशं गच्छन्त्यरातयः ॥ १० ॥

अनेक युद्धविजयीकी जिससे संधि होजातीहै उसके प्रभावसे बहुतसे शत्रु उसके आधीन होजाते हैं ॥ १० ॥

सन्धिमिच्छेत्समेनापि सन्दिग्धो विजयो युधि ।
न हि सांशयिकं कुर्यादित्यवाच बृहस्पतिः ॥ ११ ॥

जो युद्धके विजयमें सन्देह हो तो समानसेभी संधि करले परन्तु संदिग्ध कार्य न करे ऐसा बृहस्पतिने कहा है ॥ ११ ॥

सन्दिग्धो विजयो युद्धे जनानामिह युध्यताम् ।
उपायत्रितयादूर्द्धं तस्माद्युद्धं समाचरेत् ॥ १२ ॥