भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३०३ )

पंडित जन नाश करने योग्य शत्रुकोभी बढाते हैं कारण कि, गुडसे वृद्धिको प्राप्त हुआ कफ सुखसे निपातन कियाजाताहै ( इसी प्रकार प्रथम विश्वासको उत्पन्न कर शत्रुको बढावे पीछे मार डाले ) ॥ ६१ ॥

तथाच-
तैसेही-

स्त्रीणां शत्रोः कुमित्रस्य पण्यस्त्रीणां विशेषतः ।
यो भवेदेकभावेन न स जीवति मानवः ॥ ६२ ॥

स्त्रीका, शत्रु का, कुमित्रका विशेषकर वेश्याओका जो मित्र होता है वह मनुष्य जीता नहीं है ॥ ६२ ॥

कृत्यं देवद्विजातीनामात्मनश्च गुरोस्तथा ।
एकभावेन कर्त्तव्यं शेषं द्वैधं समाश्रितम् ॥ ६३ ॥

देवता द्विज अपना और गुरु इनसे निरन्तर एकभावसे रहना चाहिये और शेष कृत्य द्वैधीभावसे करना चाहिये ॥ ६३ ॥

एको भावः सदा शस्तो यतीनां भावितात्मनाम् ।
स्त्रीलुब्धानां न लोकानां विशेषेण महीभृताम् ॥ ६४ ॥

ज्ञानीयतियोंको सदा एकभावसे रहना चाहिये और विशेषकर स्त्री लुब्धक तथा राजाओंको एकभाव नहीं करना चाहिये ॥ ६४ ॥

तद्वैधीभावं संश्रितस्य तव स्वस्थाने वासो भविष्यति लोभाश्रयाच्च शत्रुमुच्चाटयिष्यसि । अपरं यदि किञ्चित् छिद्रं तस्य पश्यसि तद्गत्वा व्यापादयिष्यसि” मेघवर्ण आह-“तात ! मया सोऽविदितसंश्रयः, तत् कथं तस्य छिद्रं ज्ञास्यामि”। स्थिरजीवी आह-“वत्स न केवलं स्थानं छिद्राण्यपि तस्य प्रकटीकरिष्यामि प्रणि- धिभिः । उक्तञ्च-

सो द्वैधीभावको प्राप्त होकर तुम्हारा इसी स्थानमे निवास होगा लोभके आश्रयसे शत्रुको उच्चाटन करसकोगे । और यदि किसी प्रकार उसका छिद्र देखो तो जाकर मार डालना”। मेघवर्ण बोला-‘तात मुझे उसके आश्रयकी