भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३२५ )

देशकालके न जाननेवाले परिणाममे कटु जो अप्रिय अपनेको लघु करनेवाला कारण रहित वचन बोलता है वह वचन नहीं किन्तु विष है ॥ ११३ ॥

बलोपपन्नोऽपि हि बुद्धिमान्नरः
परं नयेन्न स्वयमेव वैरिताम् ।
भिषङ्‌ममास्तीति विचिन्त्य भक्षये-
दकारणात्को हि विचक्षणो विषम् ॥ ११४ ॥

बुद्धिमान् मनुष्य बलको प्राप्त हुआभी स्वय दूसरेको अपना शत्रु न बनावे मेरा चिकित्सक है ऐसा विचार कोई अकारण विषको नहीं खाता है॥ ११४ ॥

परपरिवादः परिषदि न कथञ्चित्पण्डितेन वक्तव्यः ।
सत्यमपि तन्न वाच्यं यदुक्तमसुखावहं भवति ॥ ११५ ॥

सभामें पराई निन्दा पडितको किसी प्रकार कहनी उचित नहीं है जो कहनेसे दूसरेको बुरी लगे वह सत्य हो तो भी न कहै ॥ ११५ ॥

सुहृद्भिरातैरसकृद्विचारितं
स्वयञ्च बुद्ध्या प्रविचारिताश्रयम् ।
करोति कार्य्यं खलु यः स बुद्धिमान्
स एव लक्ष्म्या यशसाञ्च भाजनम् ॥ ११६ ॥ ”

सुहृद् और आप्त पुरुषोंसे बारबार विचार किये हुए तथा अपनी बुद्धिसे विचार कर जो कार्य करता है वही बुद्धिमान् है वही लक्ष्मी और यशका पात्र होता है ॥ ११६ ॥ ”

एवं विचिन्त्य काकोऽपि प्रयातः । तदा प्रभृति अस्माभिः सह कौशिकानाम् अन्वयगतं वैरमस्ति ? ” मेघवर्ण आह- “तात ! एवं गते अस्माभिः किं कृत्यमस्ति” । स आह,- “वत्स ! एवं गतेऽपि षाड्गुण्यात् अपरः स्थूलोऽभिप्रायोऽस्ति तमङ्गीकृत्य स्वयमेव अहं तद्विजयाय यास्यामि रिपून् वञ्चयित्वा वधिष्यामि । उक्तञ्च यतः-

ऐसा विचार कर काकभी चलागया । उस दिनसे हमारे साथ उल्लूकोंका वंशक्रमागत वैर है”। मेघवर्ण बोला,-“तात ऐसा होनेमे हमको क्या कर्तव्य है”। वह बोला---“वत्स ऐसा होनेमें भी षट् सन्धि आदिके सिवाय एक महान् अन्य