भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( ३३१ )

मुझको डालदे । और तू ऋष्यमूक पर्वतके निकट जाकर वहा परिवारके सहित स्थित हो । जबतक मै सब शत्रुओंको अपने आचरणकी विधिसे विश्वासी कर सन्मुख कर कृतार्थहो दुर्गको जानकर दिनके मध्यमें अधताको प्राप्त हुए उनको जानकर मार डालू । जाना है मैने भली प्रकार । हमारी सिद्धि अन्यथा न होगी । कारण किं हमारा आवास दुर्गम निकलनेके उपायसे शून्य केवल वधके लिये होगा । कारण कहा है कि-

अपसारसमायुक्तं नयज्ञैर्दुर्गमुच्यते ।
अपसारपरित्यक्तं दुर्गं व्याजेन बन्धनम् ॥ १२५ ॥

नीति जाननेवालोंने निकलनेके उपायसे युक्त ही दुर्गकी प्रशसा की है ( १ ) अपसारके बिना दुर्ग कारावासकी समान है ॥ १२५ ॥

न च त्वया मदर्थं कृपा कार्या । उक्तञ्च-

तुझे मेरे निमित्त कृपा करनी नहीं चाहिये । कहाहै-

अपि प्राणसमानिष्टान्पालिताँल्लालितानपि ।
भृत्यान्युद्धे समुत्पन्ने पश्येच्छुष्कमिन्धनम् ॥ १२६ ॥

प्राणोंकी समान प्यारे पालित और लालित भृत्योंको युद्धके उत्पन्न होनेमें सूखे काठको अग्निमे जैसे प्रेरण करे ॥ १२६ ॥

तथाच-
और देखो-

प्राणवद्रक्षयेद्भृत्यान्स्वकायमिव पोषयेत् ।
सदैकदिवसस्यार्थे यत्र स्याद्रिपुसंगमः ॥ १२७ ॥

भृत्योंको प्राणकी समान रक्षा करे अपने कायाकी नाई पुष्ट करे यह उसी एक दिनके निमित्त है जब शत्रुंका सगमहो ॥ १२७ ॥

तव त्वया अहं न अत्रविषये प्रतिषेधनीयः" । इत्युक्त्वा तेन सह शुष्ककलहं कर्तुमारब्धः । अथ अन्ये तस्य भृत्याः स्थिरजीविनमुच्छृंखलवचनैर्जल्पन्तमवलोक्य तस्य वधाय उद्यताः मेघवर्णेन अभिहिताः—"अहो ! निवर्तध्वं यूयम् । अहमेव अस्य शत्रुपक्षपातिनो दुरात्मनः स्वयं निग्रहं करिष्यामि" ।

१-निकलनेका मार्ग ।

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