भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४०१ )

सो यदि वह तुम्हारी प्यारी न होती तो क्यों मेरे निमित्त तुम उसको न मारते?। और जो वह वानर है तो उसके सहित तेरा स्नेह कैसा ? सो बहुत कहनेसे क्याहै यदि उसका हृदय भक्षण न करूंगी तो मेरा मरणक निमित्त कृत सकल्प जानो" । इस प्रकार वह उसके निश्चयको जान चिन्तासे व्याकुल हृदय हो बोला । अथवा अच्छा कहा है-

"वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च ।
एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोस्तथा ॥ १०॥

"वज्रलेप ( महा ) मूर्ख, नारी, केंकडा, मत्स्य, नीली और मद्यप इनका एकवारही दृढग्रह होता है ॥ १० ॥

तत् किं करोमि ? कथं स मे वध्यो भवति" इति विचि-
न्त्य वानरपार्श्वमगमत् । वानरोऽपि चिरायान्तं तं सोद्वेग-
मवलोक्य प्रोवाच "भो मित्र ! किमद्य चिरवेलायां समा-
यातोऽसि ? कस्मात् साह्लादं न आलपसि ? न सुभाषितानि
पठसि ?"स आह-"मित्र ! अहं तव भ्रातृजायया निष्ठुर-
तरैर्वाक्यैरभिहितः-" भोः कृतघ्न ! मा मे त्वं स्वमुखं दर्शय
यतः त्वं प्रतिदिनं मित्रं उपजीवसि न च तस्य पुनः प्रत्युप-
कारं गृहदर्शनमात्रेण अपि करोषि । तत् ते प्रायश्चित्तमपि
नास्ति । उक्तञ्च-

सो क्या करू किस प्रकार उसको मारू" । ऐसा विचार कर वानरके समीप आया, वानर भी उसे आता देख उद्वेगपूर्वक बोला,-“ भो मित्र ! क्या आज देरसे आये ? क्यों आनन्दपूर्वक नहीं बोलते हो ? क्यो नहीं अच्छे वचन पढते हो ?" यह बोला-“मित्र ! मैं तेरी भाभीसे आज निष्ठुर बचनसे ताडित हुआ हू । उसने कहा है-“भो कृतघ्न ! तू मुझे अपना मुख मत दिखला जो कि तू प्रतिदिन मित्रोंसे उपजीवित होताहै परन्तु घर दिखाने मात्रसे भी उसका प्रत्युपकार नहीं करता है, सो तेरा प्रायश्चित्त भी नहीं है। कहा है-

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते शठे ।
निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ ११ ॥

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