भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 527

( ५१२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ऐसा कहकर अन्धेने जाकर उस पटहको स्पर्श किया । "भो ! मैं उस कन्याको विवाहूंगा जो राजा मुझे कन्याको देगा"। तब उन राजपुरुषोंने राजासे जाकर कहा-"देव ! किसी अन्धेने वह घोषणाका वाजा छुआ है। सो इसमें देवही प्रमाण है"। राजा बोला,-

अन्धो वा बधिरो वापि कुष्ठी वाप्यन्त्यजोऽपि वा । प्रतिगृह्णातु तां कन्यां सलक्षां स्याद्विदेशजः ॥ ९९ ॥"

अन्धा, बहरा, कुष्ठी, अन्त्यज ( नीच ) कोईहो लाख अशरफी सहित कन्याको ग्रहण करे और देशसे बाहर हो ॥ ९९ ॥"

अथ राजादेशात् तैः रक्षापुरुषैः तं नदीतीरे नीत्वा सुवर्णलक्षेण समं विवाहविधिना त्रिस्तनीं तस्मै दत्त्वा जलयाने निधाय कैवर्त्ताः प्रोक्ताः-“भोः ! देशान्तरं नीत्वा कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने अन्धः सपत्नीकः कुब्जकेन सह मोचनीयः” । तथानुष्ठिते विदेशम् आसाद्य कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने कैवर्त्तदर्शिते त्रयोऽपि मूल्येन गृहं प्राप्ताः सुखेन कालं नयन्ति स्म, केवलम् अन्धः पर्य्यङ्के सुप्तः तिष्ठति । गृहव्यापारं मन्थरकः करोति, एव गच्छता कालेन त्रिस्तन्याः कुब्जकेन सह विकृतिः समपद्यत । अथवा साधु इदमुच्यते,-

तब राजाकी आज्ञासे उन राजपुरुषोंने उसे नदीके किनारे लेजाकर लाख सुवर्णके साथ ही विवाह विधिसे वह तीन स्तनकी कन्या उसे देकर नावमें बैठाय मल्लाहोंसे कहा-“भो ! इन्हें देशान्तरमें लेजाकर किसी स्थानमें स्त्रीसहित अन्धे कुबडेको छोडदो" ऐसा करनेपर विदेशको प्राप्त हो कैवर्तकके दिखाये किसी स्थानमें वे तीनों मूल्यके साथ घरको प्राप्त हुए सुखसे समयको विताने लगे। केवल अन्धा पलंगके ऊपर सोताही रहता । घरका कार्य्य कुबडा करता इस प्रकार समय जाते त्रिस्तनीके साथ लगडेका व्यभिचार प्रगट हुआ । अथवा यह अच्छा कहा है-

यदि स्याच्छीतलो वह्निश्चन्द्रमा दहनात्मकः । सुस्वादुः सागरः स्त्रीणां तत्सतीत्वं प्रजायते ॥ १०० ॥

जो अग्नि शीतल चन्द्रमा जलनेवाला और सागर स्वादिष्ट हो तौ कदाचित् स्त्रियोंमें सतीत्व होजाय ॥ १०० ॥