भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ५१ )

धनको प्राप्त होकर कौन गर्वित न हुआ? किस विषयी पुरुषकी आपत्ति नाश हुई है ? पृथ्वीमें स्त्रियोंसे किसका मन खण्डित नहीं हुआ ? राजाका प्यारा कौन है ? कालके गोचर कौन नहीं हुआ ? कौन मांगनेवाला गौरवको प्राप्त हुआहै ? और कौन पुरुष दुर्जनोंकी गोष्ठीमे बैठकर कुशलताको प्राप्त हुआहै ? कोई नहीं ॥ १९७ ॥

तथा च–
और भी कहाहै–

काके शौचं द्यूतकारे च सत्यं
सर्पे क्षान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः ।
क्लीबे धैर्य्यं मद्यपे तत्त्वचिन्ता
राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं वा ॥ १९८ ॥

कौएमें पवित्रता, जुएमे सत्य, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें कामशान्ति, नपुंसकमे धैर्य्य, मद्यपमें तत्त्वचिन्ता, और राजा मित्र किसने देखा वा सुना है? ॥ १९८ ॥

अपरं मया अस्य भूपतेरथवा अन्यस्यापि कस्यचित राजसम्बन्धिनः स्वप्नेऽपि न अनिष्टं कृतम् । तत्किमेतत् पराङ्मुखो मां प्रति भूपतिः" इति । एवं तं दन्तिलं कदाचित राजद्वारे विस्तम्भितं विलोक्य सम्मार्जनकर्त्ता गोरम्भो विहस्य द्वारपालानिदमूचे—“भो भो द्वारपालाः ! राजप्रसादाधिष्ठितोऽयं दन्तिलः स्वयं निग्रहानुग्रहकर्त्ता च । तदनेन निवारितेन यथा अहं तथा यूयमपि अर्द्धचन्द्रभागिनो भविष्यथ” । तच्छ्रुत्वा दन्तिलश्चिन्तयामास । “नूनमिदमस्य गोरम्भस्य चेष्टितम् । अथवा साध्विदमुच्यते–

मैंने इस राजाका तथा अन्य किसी राजसम्बन्धीका स्वप्नमेंभी अनिष्ट नहीं किया सो यह क्या है जो राजा मुझसे विरुद्ध है”। इस प्रकार उस दन्तिलको कभी राज द्वारमें स्तम्भित देखकर सम्मार्जनकर्ता वह गोरम्भ हँसकर द्वारपालसे बोला–“हे द्वारपाल ! राजप्रसादमें प्राप्त हुआ यह दन्तिल स्वयं निग्रह और अनुग्रहका कर्ता है, सो इसके निवारण करनेसे जैसे मैं इसी प्रकारसे तुमभी