भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ६० ) पञ्चतन्त्रम् ।

देकर मैं इसका शिष्यबनूं, जिससे यह विश्वासको प्राप्तहुवा कदाचित् मेरे विश्वासमें आजाय । कहाहै-

निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः । नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्फुटवक्ता न वञ्चकः ॥ १७५ ॥"

निस्पृह अधिकारी नहीं होता, अकामी शृंगारप्रिय नहीं होता, मूर्ख कभी प्रिय नहीं बोलसकता, साफ कहनेवाला ठग नहीं होता ॥ १७५ ॥"

एवं निश्चित्य तस्यान्तिकमुपगम्य "ॐनमः शिवायोति" प्रोच्चार्य साष्टांगं प्रणम्य च सप्रश्रयमुवाच-"भगवन् ! असारः संसारोऽयं, गिरिनदीवेगोपमं यौवनं, तृणाग्रिसमं जीवितम्, शरदभ्रच्छायासदृशा भोगाः, स्वप्नसदृशो मित्रपुत्रकलत्रभृत्यवर्गसम्बन्धः । एवं मया सम्यक् परिज्ञातम् । तत् किं कुर्वतो मे संसारसमुद्रोत्तरणं भविष्यति" । तच्छ्रुत्वा देवशर्म्मा सादरमाह-- "वत्स ! धन्योऽसि यत्प्रथमे वयसि एवं विरक्तिभावः । उक्तञ्च-

यह विचारकर उसके समीप जाय "ॐ नमः शिवाय" यह उच्चारणकर साष्टांग प्रणाम कर नम्रतासे बोला-"भगवन् ! यह असार संसार है, गिरिनदीके वेगकी समान यौवन है, तृणकी अग्निकी समान जीवन है, शरदके मेघकी समान भोगहैं, स्वप्नकी समान मित्र, पुत्र, कलत्र (स्त्री) वर्गका सम्बन्धहै, यह मैंने भली प्रकार जान लिया सो क्या करनेसे मैं संसारसागरके पार हूंगा" यह सुन देवशर्मा आदरसे बोला-"हे पुत्र ! धन्य है जो पहली अवस्थामें ही तुझको यह विरक्तता उत्पन्न हुईहै । कहाहै-

पूर्वे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः । धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ १७६ ॥

जो प्रथम अवस्थामें शान्तहै वही शान्त है ऐसा मैं मानताहूं और धातुओंके क्षीण होनेमें कौन शान्त नहीं होताहै ॥ १७६ ॥

आदौ चित्ते ततः काये सतां सम्पद्यते जरा । असतान्तु पुनः काये नैव चित्ते कदाचन ॥ १७७ ॥

जरा सत्पुरुषोंके पहले चित्तमें, पीछे कायामें प्रवृत्त होतीहै, जरा अशान्तोंके शरीरमें प्राप्तहोकरभी चित्तमें नहीं होती ॥ १७७ ॥