पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जो शास्त्र शुक्र जानताहै और जो शास्त्र बृहस्पति जानता है वह स्त्रीकी बुद्धिमें कुछ विशेष नहीं है इस कारण उन स्त्रियोंकी कैसे रक्षा हो ॥ १९६ ॥
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् । इति यास्ताः कथं धीरैः संरक्ष्याः पुरुषैरिह ॥ १९७ ॥
जो असत्यको सत्य और सत्यको असत्य कहती हैं धीर पुरुष इस संसारमें उनकी किस प्रकार रक्षा कर सकतेहैं ॥ १९७ ॥
अन्यत्रापि उक्तम्- और स्थानमे भी कहाहै-
नातिप्रसंगः प्रमदासु कार्यो नेच्छेद्बलं स्त्रीषु विवर्द्धमानम् । अतिप्रसक्तैः पुरुषैर्युतास्ताः क्रीडन्ति काकैरिव लूनपक्षैः १९८
स्त्रियोंमे अतिप्रसगन करे और उनका बल बढने नदे कारण अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंखनुचे कौओंकी समान क्रीडा करती हैं ॥ १९८ ॥
सुमुखेन वदन्ति वल्गुना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा । मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदये हालहलं महद्विषम् १९९
सुन्दर मुखसे मनोहर बोलतीहैं, तीक्ष्ण चित्तसे प्रहार करती हैं स्त्रियोंके वचनमें मधु और हृदयमें हलाहल विष रहताहै ॥ १९९ ॥
अतएव निपीयतेऽधरो हृदयं मुष्टिभिरेव ताड्यते । पुरुषैः सुखलेशवञ्चितैर्मधुलुब्धैः कमलं यथालिभिः २००॥
इसी कारण उनके अधर पिये जातेहैं और हृदय मुष्टियोंसे ताडन किया जाता है, सुखलेशसे वञ्चित हुए पुरुषोंसे, मधुसे लुब्ध हुए भौरों द्वारा कमलकी समान ( भोग किया जाता है ) ॥ २०० ॥
अपिच- और भी कहतेहै-
आवर्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्ग्राह्यं यन्महद्भिर्नरवरवृषभैः सर्वमायाकरण्डं स्त्रीयन्त्रं केन लोके विषममृतयुतं धर्मनाशाय सृष्टम् २०१॥