भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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९४ पाराशरस्मृतिः [ नवमो- जब तक उस गाय का सम्पूर्ण अंग पूरा न हो जाय, तब तक उसकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए । तत्पश्चात् किसी ब्राह्मण को नम- स्कार करके उसे अर्पित कर देना उचित है ॥२१॥ यद्यसम्पूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहो भवेत् तदा । गोघातकस्य तस्याऽर्द्ध प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२२॥ सम्पूर्ण अंग ठीक होने से पहले ही यदि उस गाय की मृत्यु हो जाय तो हत्यारे को आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२२॥ काष्ठ-लोष्ठ-पाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतो बलात् । व्यापादयति यो गां तु तस्य शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥२३॥ काठ, ईंट, पत्थर या शस्त्र से सज्जित मनुष्य जब बलात् गाय का वध करे, तो उसकी शुद्धि इस प्रकार कही गयी है—॥२३॥ चरेत् सान्तपनं काष्ठे प्राजापत्यं तु लोष्टके । तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चैवाऽतिकृच्छ्रकम् ॥२४॥ काठ से मारने पर सान्तपन नामक व्रत, ईंट से प्राजापत्य, पत्थर से तप्तकृच्छ्र और शस्त्रों द्वारा आघात करने में अतिकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ॥२४॥ पञ्च सान्तपने गावः प्राजापत्ये तथा त्रयः । तप्तकृच्छ्रे भवन्त्यष्टावतिकृच्छ्रे त्रयोदश ॥२५॥ सान्तपन नामक व्रत में पाँच, प्राजापत्य में तीन, तप्तकृच्छ्र में आठ और अतिकृच्छ्र में तेरह गोदान करने का विधान बतलाया गया है ।२५।। प्रमापणे प्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिरूपकम् । तस्याऽनुरूपं मूल्यं वा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः ॥२६॥ महर्षि मनु ने कहा है कि जिस प्रकार के पशु का हनन किया गया हो, पशुपालक को बदले में वैसा ही पशु देना चाहिए अथवा