भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १११ घर में काम आनेवाली और सभी चीजों को शुद्ध कर ले अर्थात् फल से निर्मित वस्तुओं को गोबालों से, ताँबे के पात्र को पंचगव्य से और काँसे आदि के बरतनों को दस बार भस्म लगाकर मलना चाहिए॥३९॥ प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹। गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥४०॥ ब्राह्मण जाति के लोगों को अन्य ब्राह्मणों के कथनानुसार प्रायश्चित्त करना उचित है। दो प्राजापत्य व्रत करने के पश्चात् दक्षिणा में ब्राह्मण को दो गायों का दान करना चाहिए ॥४०॥ इतरेषामहोरात्रं पञ्चगव्येन शोधनम्। उपवासैर्व्रतैः पुण्यैः स्नान-सन्ध्या-ऽर्चनादिभिः॥४१॥ ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग तो एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य द्वारा शुद्धि पा लेते हैं। उपवास, व्रत, पुण्य, स्नान, सन्ध्योपासन और देवपूजन आदि ॥४१॥ जप-होम-दया-दानैः शुद्ध्यन्ते ब्राह्मणादयः। आकाशं वायुरग्निश्च मेध्यं भूमिगतं जलम् ॥४२॥ जप, हवन, दया और दान द्वारा ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति शुद्ध हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी पर गिरा हुआ शुद्ध और स्वच्छ जल ॥४२॥ न मेदुष्यन्ति² दर्भाश्च यज्ञेषु चमसा यथा॥४३॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः॥१०॥ और कुशा कभी दूषित नहीं होता। जिस प्रकार यज्ञ का चमस पात्र (हव्य पात्र) कभी अशुद्ध नहीं होता उसी प्रकार ये भी सर्वदा शुद्ध माने गये हैं ॥४३॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' हिन्दीटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥ १. 'रुपपादयेत्' इति। २. 'दुष्यन्ति च' इति। Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal