भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १७ ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं निरुपममकण्टकम् । वापयेत् सर्वबीजानि सा कृषिः सर्वकामिका ॥६४॥ ब्राह्मण का मुख सुन्दर क्षेत्र-खेत के समान है, जिसमें कंटक नहीं रहत। उस ब्राह्मण के मुखरूपी क्षेत्र में बीजों को बोने से सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि होती है। अतः ब्राह्मण को भोजन आदि से सन्तुष्ट करना चाहिए। ६४॥ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं सुपात्रे निक्षिपेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं तन्न विनश्यति ॥६५॥ बुद्धिमान् पुरुष, सुन्दर ब्राह्मण के मुखरूपी क्षेत्र में बीज बोये और सुपात्र में धन का धरोहर रखे। क्योंकि सुन्दर खेत में बोये गये बीज और सत्पात्र मे रखा गया निक्षेप (धरोहर) का नाश नहीं होता ॥६५॥ अव्रता ह्यनधीयाना यत्र भैक्ष्यचरा द्विजाः । तं ग्रामं दण्डयेद् राजा चोरभयप्रदो हि सः ॥६६॥ अध्ययन-शून्य ब्रह्मचर्यादि व्रत का अनुष्ठान न करनेवाले ब्राह्मण जिस गाँव से भिक्षा से अपनी जीविका करते हों। राजा को उचित है कि वह उस गाँव को दण्ड दे, क्योंकि वह गाँव चोरों को आश्रय देने- वाला है ॥६६॥ क्षत्रियो हि प्रजा रक्षन् शस्त्रपाणिः प्रदण्डयान् । निर्जित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत् ॥६७॥ क्षत्रिय हाथ में शस्त्र लेकर दुष्टों को दंड देता हुआ प्रजा की रक्षा करे। अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे तथा धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करे ॥६७॥ न श्रीः कुलक्रमायाता भूषणोल्लिखिताऽपि वा । खड्गेनाक्रम्य भुञ्जीत वीरभोग्यां वसुन्धराम् ॥६८॥ २ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal