भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १९ विक्रीणन् मद्य-मांसानि ह्यभक्ष्यस्य च भक्षणम् । कुर्वन्नगम्यागमनं शूद्रः पतति तत्क्षणात् ॥७३॥ मद्य तथा मांस का विक्रय करने से, अभक्ष्य वस्तु का भक्षण करने से तथा अगम्या स्त्री से गमन करने पर शूद्र तत्क्षण ही पतित हो जाता है । इसलिए इन कर्मों को शूद्र त्याग दे ॥७३॥ कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च । वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्य नरकं ध्रुवम् ॥७४॥ इति पराशरीय-धर्मशास्त्रे चातुर्वर्ण्यचारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ कपिला गौ का दूध पीने से, ब्राह्मणी के साथ संगम करने से तथा वेद के अक्षर का विचार करने ( अर्थात् वेद पढ़ने ) से शूद्र को निश्चय ही नरक होता है ॥७४॥ इस प्रकार 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में चारों वर्णों के धर्माचार नामक प्रथम अध्याय समाप्त ॥१॥ २. द्वितीयोऽध्यायः अतः परं गृहस्थस्य कर्माचारं कलौ युगे । धर्मं साधारणं शक्त्या चातुर्वर्ण्यश्रियागतम्¹ ॥ १ ॥ तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्वं पराशरवचो यथा । प्रथमाध्याय में विशेष एवं साधारण धर्म कहकर ग्रन्थकार इस द्वितीय अध्याय में कहते हैं कि अब इसके अनन्तर गृहस्थ के कर्म एवं आचार तथा उनसे शक्ति के अनुसार किये जानेवाले साधारण धर्म को मैं कहूँगा । यह कर्म आचार तथा सामान्य धर्म, कलि में चारों वर्णों का क्रमपूर्वक चला आया है, ऐसा पराशर का मत है ॥१॥ षट्कर्मनिरतो विप्रः कृषिकर्म च कारयेत् ॥ २ ॥ १. '-सहितो' इत्यपि पाठः ।