भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 170 में से

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अध्यायः ] भाषाटीकासहिता २५ परन्तु यह शुद्धि समानोदकों अर्थात् सात से चौदह पीढ़ी तक के लोगों के लिए ही जाननी चाहिए ॥१॥ क्षत्रियो द्वादशाहेन वैश्यः पञ्चदशाहकैः । शूद्रः शुद्ध्यति मासेन पराशरवचो यथा ॥ २ ॥ मरणशौच में क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पन्द्रह दिनों में तथा शूद्र एक मास में शुद्ध होता है, ऐसा पराशर का मत है । (यह शुद्धि सपिण्डों- सात पीढ़ी तक के भीतर के लोगों के लिए जाननी चाहिए ) ।२॥ उपाने तु विप्राणामङ्गशुद्धिश्च जायते । ब्राह्मणानां प्रसूतौ १ तु देहस्पर्शो विधीयते ॥ ३ ॥ परन्तु मरणाशौच में भी अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मण को उतने समय तक अशौच नहीं लगता, जितने समय तक वह अग्निहोत्र कर सकता है । जननाशौच में ब्राह्मण के शरीर के स्पर्श हो जाने पर भी कोई दोष नहीं लगता ॥३॥ जाते विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्ध्यति ॥ ४ ॥ जननाशौच में ब्राह्मण दश दिनों में, क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पन्द्रह दिनों में तथा शूद्र एक महीने में ही शुद्ध हो जाता है ॥४॥ एकाहाच्छुद्धयते विप्रो योऽग्नि-वेद-समन्वितः । त्र्यहात् केवलवेदस्तु द्विहीनो दशभिर्दिनैः ॥ ५ ॥ परन्तु जो ब्राह्मण अग्निहोत्र करनेवाला तथा वेदों का स्वाध्याय करनेवाला हो वह जननाशौच में एक ही दिन में शुद्ध हो जाता है । केवल वेदज्ञ तीन दिनों में तथा अग्निहोत्र एवं वेदज्ञान इन दोनों से शून्य ब्राह्मण दश दिन में शुद्ध होता है ॥५॥ १. विशुद्धौ' इति ।

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