भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहित। ७३ प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति ॥२०॥ स्त्री रजोधर्म के प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन रजकी ( धोबिन ) के तुल्य होती है । फिर चौथे दिन स्नान के उपरान्त शुद्ध होती है ॥२०॥ आतुरे स्नान उत्पन्ने दशकृत्वो ह्यनातुरः । स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेनं ततः शुद्ध्येत् स आतुरः ॥२१॥ यदि किसी आतुर को स्नान करना आवश्यक हो, तो अनातुर ( स्वस्थ पुरुष ) दश बार स्नान कर प्रत्येक स्नान के अनन्तर उसका स्पर्श करने से वह आतुर पुरुष शुद्ध हो जाता है ॥२१॥ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः । उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥२२॥ यदि कोई जूठे मुँहवाला ब्राह्मण किसी दूसरे जूठे मुँहवाले पुरुष अथवा कुत्ता या शूद्र का स्पर्श कर ले, तो वह ब्राह्मण एक रात उपवास कर पंचगव्य ( गौ का दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र ) का प्राशन करे तब उसकी शुद्धि होती है ॥२२॥ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण स्पर्शे स्नानं विधीयते । तेनोच्छिष्टेन संस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२३॥ यदि जूठा मुँहवाला ब्राह्मण किसी अनुच्छिष्ट शूद्र से छू जाय तो स्नान करे और यदि शूद्र जूठे मुँहवाला हो, उससे ब्राह्मण छू जाय तो प्राजापत्य व्रत करे ॥२३॥