पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें७६ पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- मेध्याऽमेध्यं स्पृशन्तोऽपि नोच्छिष्टं मनुरब्रवीत् । महीं स्पृष्ट्वाऽऽगतं तोयं याश्चाप्यस्याऽऽस्यविप्रुषः ॥३३॥ ये पवित्र अथवा अपवित्र वस्तु को छूते रहते हैं। इसलिए इनके स्पर्श से कोई वस्तु उच्छिष्ट नहीं होती, ऐसा मनु का वचन है। धरती में गिरकर आनेवाला जल अथवा बोलने में मुख के द्वारा गिरा हुआ थूक का छींटा, ॥३३॥ भुक्तोच्छिष्टं तथा स्नेहं नोच्छिष्टं मनुरब्रवीत् । ताम्बूलेक्षु-फले चैव भुक्तस्नेहानुलेपने ॥३४॥ खाने में बार-बार ग्रास (कौर) ग्रहण करने में तथा शरीर पर लगाने से अवशिष्ट रहनेवाला तेल आदि पदार्थ झूठे नहीं कहे जाते। ताम्बूल, फल, ऊख, भोजनकाल में लगा हुआ चिकना घी आदि पदार्थ, ॥३४॥ मधुपर्के च सोमे च नोच्छिष्टं धर्मतो विदुः । रथ्याकर्दम-तोयानि नावः पन्थास्तृणानि च ॥३५॥ मधुपर्क, सोमलता रस ये सभी पदार्थ धर्मतः झूठे नहीं होते। गली, कीचड़ का जल, नौका, सड़क तथा तृण, पके हुए ईंटों का भट्ठा ॥३५॥ मारुतार्केण शुद्ध्यन्ति पक्वेष्टकचितानि च । अदुष्टाः सन्तता धारा वातोद्धताश्च रेणवः ॥ ३६ ॥ ये सभी पदार्थ वायु तथा सूर्य की किरणों के संयोग से सदैव शुद्ध रहते हैं। सदैव बहती हुई धारा तथा वायु के झोंके से उड़ी हुई धूल भी अशुद्ध नहीं होती ॥३६॥