पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 9, कुल 170 में से
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उपोद्घात वचन
धर्म का स्वरूप अत्यन्त निगूढ है । ‘धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्’ ( महाभारत ) । वह वेदैक समधिगम्य है । ‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’ ( मीमांसा ) । वह मीमांसा शास्त्र अति गम्भीर और विपुल विशाल है । उसमें सहस्र अधिकरणों से धर्म की विवेचना की गयी है । ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस- सिद्धिः स धर्मः’ ( वैशे० दर्शन ) । धर्म प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से जानने की वस्तु नहीं है । ‘प्रत्यक्षेणानुमानेन यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एतं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥’ नास्तिक, जो वेद-निन्दक हैं, ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ ( मनु० ), अनेक कटाक्ष धर्म पर करते हैं । उनके नैयायिक वाचस्पति मिश्र, उदयनाचार्य आदि ने दुरूह युक्तियों से मुंहतोड़ उत्तर दिये हैं । धर्म के लिए प्रमुख प्रमाण सहस्र- शाखाओं से परिपूर्ण मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद, तदनुयायी ऋषियों से प्रणीत मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम, शङ्ख, लिखित, पराशर, व्यास प्रभृति स्मृतियाँ, पुराण, उपपुराण, महाभारत शिष्टाचार हैं । उनका अवगम सायण, उव्वट, महीधर आदि के भाष्य, निघण्टु, निरुक्त, हेमाद्रि, कमलाकर भट्ट, कुल्लूक, मिताक्षरा आदि निबन्ध और व्याख्याओं से होता है । व्याकरण, ज्योतिष आदि षडङ्ग, छहों दर्शन, उनके ऊपर विरचित भगवत्पाद शंकराचार्य, रामानुजाचार्य प्रभृति सम्मान्य आचार्यों के भाष्य हैं, जो धर्म का यथार्थ अवबोध कराते हैं । वचनों में सामान्य, विशेष, उत्सर्ग और अपवाद भाव, आपाततः विरोध प्रतीत होते हैं, पर त्रिकालवेत्ता, सम्पूर्ण परिस्थितियों के अभिज्ञ, राग-द्वेष- रहित, परमतपस्वी महायोगिराज, परम्परया अध्ययन-अध्यापन, आचरण से सम्पन्न समस्त शास्त्रों के आलोडन-मंथन करनेवाले कुमारिल, शबर स्वामी, पार्थसारथिमिश्र आदि महापण्डितों ने मीमांसा-परिशोधित न्यायों के
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal