पारस्कर गृह्यसूत्र (मार्गदर्शिनी टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

पारस्कर गृह्यसूत्र (मार्गदर्शिनी टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Paraskara Grihyasutra Hindi
महर्षि पारस्कर (टीकाकार: कुलमणि मिश्र शर्मा) द्वारा
स्रोत: Paraskara Grihyasutram with Margadarshini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished263 पृष्ठ
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( III )
| सूत्राणि | का.क.सू. | पृष्ठाङ्कः | सूत्राणि | का.क.सू. | पृष्ठाङ्कः |
|---|---|---|---|---|---|
| अयुजाक्षर | १।७।३ | ६७ | आचार्येण | २।५।२८ | ९६ |
| अरण्यो प्रदान | १।२।५ | ५ | आजं गव्यं वा | २।५।१८ | ९५ |
| अर्धं प्रति | १।३।१४ | १२ | आज्यभागा | २।१०।३ | ११६ |
| अर्धं चेदव | ३।६।३ | १७५ | आज्यं मुद्गा | १।१।४ | ३ |
| अर्थं षष्ठान् | २।११।१० | १२२ | आज्यं संस्कृ | ३।४।८ | १६६ |
| अर्थं सप्त | २।११।११ | १२२ | आट्या ब्रह्म | १।१९।९ | ७२ |
| अलङ्करण | २।६।२१ | १०६ | आद्वाविंशा | २।५।३७ | ९८ |
| अवज्योत्य | २।८।८ | ११२ | आपोहिष्ठेति | १।८।६ | ३७ |
| अवनेज्य | २।१४।२१ | १३० | आपोहिष्ठेति | ३।५।४ | १७४ |
| अश्वो वैश्य | १।८।१७ | ४० | आवसथ्यावानं | १।२।१ | ४ |
| अष्टकायै | ३।३।७ | १६० | आश्वत्थेषु | २।१५।५ | १३३ |
| अष्ट चत्वारिं | २।५।१३ | ९४ | आश्वयुज्यां | २।१६।१ | १३४ |
| अष्टवर्षं | २।२।२ | ८० | आषोडशा | २।५।३६ | ९८ |
| असम्भव | २।१७।५ | १३६ | आसनमाह्य | १।३।५ | ९ |
| असावहं | २।२।२१ | ८५ | आहरन्ति | १।३।६ | १० |
| अस्तमितानु | १।९।२ | ४२ | इतरयो | १।२१।४ | ७७ |
| अस्तमिते | १।८।१९ | ४० | इन्द्रं दैवी | २।१५।९ | १३४ |
| अहतं वासो | २।६।५ | १०४ | इन्द्रं पर्जन्य | २।१२।३ | १२५ |
| अहरहः | २।९।१६ | ११५ | इन्द्रं श्रेष्ठानि | १।१८।६ | ६९ |
| अहरहरन्न | ३।१०।५३ | १९८ | उतूल परिमेहः | ३।७।१ | १७६ |
| अहिंसन्नर | २।५।८ | ९३ | उत्तरत एकेषां | १।८।४ | ३७ |
| आचतुर्विंशा | २।५।३८ | ९८ | उत्तर पूर्वस्यां | ३।५।२ | १७३ |
| आचम्य प्राणा | १।३।२६ | १५ | उत्तरिष्यन् | ३।१५।११ | २१२ |
| आचान्तोदका | १।३।२७ | १५ | उत्तरे सन्धा | ३।४।१४ | १७१ |
| आचामत्या | १।३।१६ | १२ | उत्तीर्णाञ्जिच्छो | ३।१०।२० | १९१ |
| आचार्य ऋत्वि | १।३।२ | ९ | उत्साह | २।६।१६ | १०३ |
| आचार्याय भै | २।५।८ | ९३ | उत्सृष्टेष्ववभ | २।११।३ | १२१ |
| आचार्याय वरं | १।८।१४ | ३१ | उदकान्तं गत्वा | २।१२।२ | १२४ |
| आचार्याय वरं ददा | २।१।२१ | ७९ | उदगयन | १।४।५ | १९ |
| आचार्यायान्ते | ३।३।१३ | १६२ | उदपात्रं | १।१६।१८ | ६३ |
| आचार्ये चैवं | ३।१०।३८ | १९५ | उदपान | २।७।७ | १०८ |