पारस्कर गृह्यसूत्र (मार्गदर्शिनी टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

पारस्कर गृह्यसूत्र (मार्गदर्शिनी टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Paraskara Grihyasutra Hindi
महर्षि पारस्कर (टीकाकार: कुलमणि मिश्र शर्मा) द्वारा
स्रोत: Paraskara Grihyasutram with Margadarshini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished263 पृष्ठ
पृष्ठ 248, कुल 263 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 248
( VI )
| सूत्राणि | का.क.सू. | पृष्ठाङ्काः | सूत्राणि | का.क.सू. | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|
| ताश्च तेषां | ३।१०।४२ | १९५ | दधि क्राव्ण | २।१०।१६ | ११८ |
| तिल मुद्ग् | १।१५।४ | ५५ | दधि तिलान् | २।६।१२ | १०३ |
| तिस्रो प्रत्या | २।५।५ | ९३ | दधि मधु | २।१६।४ | १३५ |
| तिस्रो ब्राह्मण | १।४।९ | १९ | दध्ना तरडु | १।९।३ | ४२ |
| तिस्रो रात्री | २।८।१ | १११ | दन्त प्रक्षा | २।६।२७ | १०७ |
| तूष्णीं ग्रामा | ३।१०।१२ | १८९ | दर्वी शूर्पं | २।१४।१५ | १३१ |
| तूष्णीं वा | २।२।१३ | ८२ | दर्व्याच्चिममं | २।१४।१९ | १३२ |
| तृतीये वा | २।१।२ | ७४ | दशम्या | १।१७।१ | ६६ |
| तेषां संस्कारे | २।५।४३ | ९९ | दशरात्र | ३।१०।२९ | १९३ |
| त्रयः स्नातकाः | २।५।३२ | ९७ | दायाद्यकाल | १।२।२ | ४ |
| त्रिः परिणीता | १।७।६ | ३५ | दिग्भ्यश्चन्द्र | २।१०।७ | ११६ |
| त्रिः क्षुरेण | २।१।१७ | ७८ | दिवस्परि | १।१६।९ | ६० |
| त्रि पुरुषं | २।५।४२ | ९९ | दिवे सूर्या | २।१०।६ | ११६ |
| त्रिरात्रं नाधी | २।१०।२३ | १२० | दीक्षा वदे | २।२।१६ | ८४ |
| त्रिरात्रं ब्रह्म | ३।१०।२३ | १९२ | दीक्षितो | २।८।१० | ११२ |
| त्रिरात्रं श्राव | ३।१०।२८ | १९३ | दृढव्रतो | २।७।२० | ११० |
| त्रिरात्रं सहोष्य | २।११।१३ | १२३ | देवतां चा | ३।११।५ | २०० |
| त्रिरात्रमक्षा | १।८।२१ | ४१ | देवस्य त्वे | १।३।१८ | १३ |
| त्रिवृतमावध्ना | १।१५।६ | ५६ | द्वादशके | २।६।३ | १०० |
| त्रिषु त्रिषु | १।४।७ | १९ | द्वादश द्वादश | २।५।१३ | ९४ |
| त्रिष्टुभं | २।३।८ | ८८ | द्वादश रात्रं | २।१।२४ | ७९ |
| त्र्यायुषमिति | १।१६।७ | ५९ | द्वादशवर्षं | २।२।४ | ८० |
| त्रेण्या | २।१।१० | ७६ | द्वारदेशे मा | २।१४।१६ | १३१ |
| त्वन्नो अग्ने | १।२।८ | ६ | द्वार देशे सू | १।१६।१९ | ६४ |
| दक्षिणत | २।३।४ | ८७ | द्विवर्षं प्रभु | ३।१०।८ | १८८ |
| दक्षिणोऽस्य | १।१८।५ | ६९ | द्वे राजन्यस्य | १।४।१० | २० |
| दक्षिणो सन्वा | ३।४।१२ | १७० | द्वयक्षरं | १।१७।२ | ६६ |
| दक्षिणतः स्वा | ३।२।७ | १५० | धनुर्ज्यां | २।५।२१ | ९५ |
| दक्षिणतो | ३।२।८ | १५० | धानाः प्राश्न. | २।१४।२० | १३२ |
| दण्डं प्रय | २।२।१४ | ८३ | धानानां | २।१४।४ | १२७ |
| दण्ड धारण | २।५।१० | ९४ | धानावन्त | २।१४।६ | १२८ |