भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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९४ पातञ्जलयोगदर्शन

हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब 'उदित' कहलाते हैं। इन्हींको वर्तमान भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना।

( ३ ) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे 'शान्त' कहलाते हैं, इन्हींको अतीत भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना।

धर्मोंकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य—इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है। किसी भी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥१४॥

**सम्बन्ध—**एक ही धर्मीके भिन्न-भिन्न अनेक धर्म-परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं—

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५॥

'परिणामकी भिन्नतामें क्रमकी भिन्नता कारण है।'

**व्याख्या—**एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है, अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है। जैसे हमें रूईसे वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लंबा ताना करेंगे, फिर उसे सानेमेंसे पार करके रोलरपर चढ़ायेंगे,