पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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| पाद | सूत्र | पृष्ठ |
|---|---|---|
| संतोषादनुत्तमसुखलाभः ... | २ | ४२ |
| संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् ... | ३ | १८ |
| सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः | ३ | ११ |
| सुखानुशयी रागः ... | २ | ७ |
| सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ... | १ | ४५ |
| सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञान- <br> मरिष्टेभ्यो वा ... | ३ | २२ |
| स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् | ३ | ५१ |
| स्थिरसुखमासनम् ... | २ | ४६ |
| स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयः | ३ | ४४ |
| स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का | १ | ४३ |
| स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ... | १ | ३८ |
| स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः | २ | ९ |
| स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः | २ | ५४ |
| स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः | २ | २३ |
| स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ... | २ | ४४ |
[ ह ]
हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ... | ४ | २८ | १४६ हृदये चित्तसंवित् ... | ३ | ३४ | १०५ हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः | ४ | ११ | १३३ हेयं दुःखमनागतम् ... | २ | १६ | ५५