भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

५५

साधनपाद-२

हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥

‘आनेवाला दुःख हेय (नष्ट करने योग्य) है।’

व्याख्या—वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है। तथा जो वर्तमान हैं, वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परंतु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्यकर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है ॥१६॥

सम्बन्ध—जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है, क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह पुनः उत्पन्न हो सकता है। अतः उक्त ‘हेय’का हेतु (कारण) बतलाते हैं—

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

‘द्रष्टा और दृश्यका संयोग (उक्त) हेयका कारण है।’

व्याख्या—ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी जड-चेतनकी ग्रन्थि है। अतः इस संयोगका नाश कर देनेसे मनुष्य सर्वथा दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥१७॥

सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग—इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं—