फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ १०. दसवाँ अध्याय : कलत्रभाव । चन्द्र या लग्न से पांचवाँ और सांतवां स्थान-शुक्र से चतुर्थ, अष्टम द्वादश में क्रूर ग्रह-सप्तमेश तथा सप्तम स्थान गत ग्रहों का फल-वृश्चिक में शुक्र-मकर राशि में गुरु-मीन में शनि, कर्क में मंगल, शनि-मंगल या शनि के वर्ग में शुक्र-चन्द्र शुक्र यदि मंगल शनि से सप्तम हों-पत्नी संख्या-पत्नी नाश के योग-चन्द्र-शनि योग-सप्तम में शत्रुक्षेत्री या नीच ग्रह-सम विषम राशि से फल में तारतम्य-द्वितीयेश, सप्तमेश और व्ययेश-विवाह की दिशा-किस दशा या अन्तर्दशा में विवाह-किस दशा, अन्तर्दशा में पत्नी मरण । पृ० २१७-२२३ ११. ग्यारहवाँ अध्याय : स्त्रीजातक । स्त्रियों की जन्म कुंडली में मांगल्य (सधवा स्थिति) अष्टमभाव से-पुत्र नवम से-पति विचार सप्तम से-सतीत्व चतुर्थ से-सम, विषम राशियों में लग्न और चन्द्र-उत्तम या निकृष्ट पति प्राप्ति के योग- अल्पसुत योग--शुभ योग-लग्न तथा चन्द्र का त्रिंशांश के अनुसार फल- नक्षत्र विशेष में जन्म का फल-सास, ससुर, देवर आदि के लिये शुभा- शुभ फल-वन्ध्या योग-विधवा योग-सन्तति नाश योग-गर्भाधान का शुभ समय । पृ २२४-२३० १२. बारहवाँ अध्याय : पुत्र भावफल । लग्न तथा चन्द्र से पंचम भाव तथा पंचमेश-इनके शुभाशुभ योग- पापीग्रह यदि स्वराशि का पंचम में हो-यदि अन्य पाप ग्रह पंचम में हो-यदि पंचम भाव में सिंह, कन्या या वृश्चिक हो-बिलम्ब से पुत्रोत्पत्ति योग-दूसरी पत्नी से पुत्रयोग-अधिक संतति योग-अधिक कन्या योग-