भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

११४ फलदीपिका ऐसा है, यही पुष्ट किया कि उनके विचार से तो चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम* योग होता है। केमद्रुम योग का फल अच्छा नहीं। केमद्रुम योग होने से मनुष्य मलिन, दुःखित, निर्धन, दूसरे की मातहती में काम करने वाला, नगण्य होता है। केमद्रुम योग की इतनी निन्दा की गई है कि यदि राजवंश में पैदा हो तो भी उपर्युक्त बातें उसमें लागू हों। किन्तु पाठकों का विशेष ध्यान इस ओर दिलाया जाता है कि केवल किसी एक योग से नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिये। अब ऊपर जो अनफा, सुनफा और दुरुधरा यह जो तीन योग पृथक्-पृथक् बताये गये हैं, उनका फल बताते हैं। जो सुनफा योग में पैदा होता है वह पार्थिव (राजा) हो या उसके समान हो। सुनफा योग वाला बुद्धिमान्, धनवान् होता है और उसको ख्याति प्राप्त होती है। जो अनफा योग में पैदा होता है वह देखने में उत्तम होगा, शीलवान् हो, उसको सांसारिक भोग के साधन उपलब्ध हों, सन्तोषी और प्रसन्न हो, उत्तम वस्त्र धारण करें और उसका शरीर स्वस्थ रहे। अनफा योग वाला शीलवान् होता है और समाज में प्रतिष्ठित होता है। जो व्यक्ति दुरुधरा योग में उत्पन्न हो वह त्यागशील हो, सुखी हो; धनी हो, उसको सवारियों की कमी न रहे और सांसारिक सुखों के अनेक साधन जैसे-जैसे उसे उपलब्ध हों वैसे वैसे उनका भोग करता रहे। हित्वेन्दुं शुभसिवैवास्युभयचर्याख्याः स्वरिःफोभय- स्थानस्थैः सवितुः शुभैः स्युरशुभैस्ते पापसंज्ञाः स्मृताः । सत्पार्श्वे शुभकर्तरीत्युदयभे पापैस्तु पापाह्वयो लग्नाद्वित्तगतैः शुभैस्तु सुशुभो योगो न पापेक्षितैः ॥ ८ ॥

  • इस सम्बन्ध में देखिये बृहज्जातक के अध्याय तेरह श्लोक २ की टीका।