फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १२७ धीमन्नाटकगद्यपद्यगणनालङ्कारशास्त्रेष्वयं निष्णातः कविताप्रबन्धरचनाशास्त्रार्थपारंगतः । कीर्त्याक्रान्तजगत्तत्रयोऽतिधनिको दारात्मजैरन्वितः स्यात् सारस्वतयोगजो नृपवरैः संपूजितो भाग्यवान् ॥२७॥ इन श्लोकों में "सरस्वती" योग तथा उसका फल बताते हैं । यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) कोण (५, ९) या द्वितीय स्थान में हों और बृहस्पति स्वराशि मित्र राशि या उच्च राशि में बलवान् हो तो 'सरस्वती' योग होता है । साथ में पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज की जन्मकुण्डली दी जाती है। इनका जन्म उत्तरप्रदेश में प्रतापगढ़ में ११ अगस्त सन् १९०७ को हुआ । इसमें बुध, वृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र में हैं और वृहस्पति उच्च राशि का बलवान् है। बृहस्पति के ५ अंश हैं और वह परमोच्च है उसे केन्द्र
[कुण्डली विवरण]:
- भाव १ (मेष): लग्न
- भाव २ (वृष)
- भाव ३ (मिथुन): रा.
- भाव ४ (कर्क): शु, सू. ४, बु, बृ.
- भाव ५ (सिंह): ५ चं.
- भाव ६ (कन्या): ६
- भाव ७ (तुला): ७
- भाव ८ (वृश्चिक): ८
- भाव ९ (धनु): ९ मं के
- भाव १० (मकर): १०
- भाव ११ (कुम्भ): ११
- भाव १२ (मीन): श १२
बल प्राप्त है तथा पूर्ण दिक्बल भी प्राप्त है। इस प्रकार बृहस्पति के पूर्ण बलवान् होने से बहुत उत्तम रूप से 'सरस्वती' योग घटित होता है । अब सरस्वती योग का फल बताते हैं । जिस व्यक्ति की जन्म- कुण्डली में सरस्वती योग हो वह बहुत बुद्धिमान्, नाटक, गद्य, पद्य (काव्य) अलंकार शास्त्र तथा गणित शास्त्र में महान् पटु और विद्वान् होता है। काव्य रचना, प्रबन्ध (सुन्दर लेख या सुन्दर पुस्तक लेखन) तथा शास्त्रार्थ में भी ऐसा व्यक्ति पारंगत (पूर्ण पंडित) होता है। तीनों लोकों में उसकी कीर्ति फैलती है। अति धनी होता है । स्त्री