भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१६२ फलदीपिका छिद्रारिव्ययनायकाः प्रबलगाः केन्द्रत्रिकोणाश्रिताः लग्नव्योमचतुर्थभाग्यपतयः षड्रन्ध्ररिःफस्थिताः निर्वीर्या विगतप्रभा यदि तदा दुर्योग एव स्मृत- स्तद्व्यस्ते सति योगवान्धनपतिर्भू'पः सुखी धार्मिकः ॥७०॥ यदि षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश के स्वामी प्रबल (बलवान्) होकर केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में हों और लग्न, चतुर्थ, नवम तथा दशम इन चारों भवनों के स्वामी निर्वीय (बलहीन) और अस्त (सूर्य के समीप रहने के कारण) होकर ६, ८, १२ स्थान या स्थानों में हो तो 'दुर्योग ही होता है । अर्थात् यह खराब योग है। यदि इससे उलटा हो अर्थात् ६, ८, १२ के मालिक बलहीन हो कर दुःस्थान में पड़ें और लग्न चतुर्थ नवम दशम के स्वामी बलवान् पूर्ण प्रभा से युक्त (अस्त नहीं) सुस्थान में पड़ें तो ऐसा योगवाला धनपति (लक्ष्मीवान्) राजा (अर्थात् ऐश्वर्यशाली) सुखी और धार्मिक होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ६,८,१२ दुःस्थान हैं। इनके स्वामी निर्बल होने चाहियें। १,४,९,१० विशिष्ट स्थान हैं इनके स्वामी बलवान् होने चाहियें । विष जितना थोड़ा और कमजोर हो उतना अच्छा । अमृत जितना अधिक और बलशाली हो उतना अच्छा । ॥७०॥

  • हमारे विचार से ५७-७० स्लोकों में जो योग गनाए गए हैं। वे प्रधानतः भावेशों से विचार करना चाहिए, भाव से भी। परन्तु तारतम्य कर लेना चाहिए, जैसे द्वादश का स्वामी दुःस्थान में हो तो विमल योग होगा । बारहवें भाव में अशुभ ग्रह होने से योग नहीं होगा । हमने अपने विचार से 'तारतम्य करते हुए ग्रंथकार का अभिप्राय वर्णन किया है।
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