फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ फलदीपिका सत्पुत्रजायाधनधान्यभाग्यं ददात्ययं सर्वजनानुकूल्यम् ॥१६॥ गते ग्रहे शत्रुगृहं निकृष्टतां परान्नवृत्तिं परमन्दिरस्थितिम् । अकिंचनत्वं रिपुपीडनं सदा स्निग्धोऽपि तस्यातिरिपुत्वमाप्नुयात् ॥१७॥ नीचे ग्रहेऽधः पतनं स्ववृत्तेर्दैन्यं दुराचारमृणाप्तिमाहुः । नीचाश्रयं कीकटदेशवासं भृत्यत्वमध्वानमनर्थकार्यम् ॥१८॥ ग्रहो मौढ्यं प्राप्तो मरणमचिरात् स्त्रीसुतधनैः प्रहीणत्वं व्यर्थे कलहमपवादं परिभवम् । समर्क्षस्थः खेटो न कलयति वैशेषिकफलं सुखं वा दुःखं वा जनयति यथापूर्वमचलम् ॥१९॥ वक्रं गतः स्वोच्चफलं विदध्या त्सपत्ननीचर्क्षगतोऽपि खेटः । वर्गोत्तमांशस्थितखेचरोऽपि स्वक्षेत्रगस्योक्तफलानि तद्वत् ॥२०॥ जिस राशि का विचार करना हो उस राशि का जो आश्रय स्वभाव, रूप वर्ण आदि बताया गया हो उसका पूर्ण विचार रखना चाहिये। राशीश (राशि का स्वामी) पूर्ण बलवान् है या नहीं—कहां बैठा है, किसके साथ बैठा है, राशीश पर किस-किस की दृष्टि है तथा उस राशि में कौन-कौन से ग्रह बैठे हैं तथा कौन-कौन से ग्रह उस राशि को देखते हैं इन सबका विचार करके युक्तिपूर्वक (अर्थात् उपर्युक्त सभी बातों को मद्देनज़र रखते हुए—किस व्यक्ति की जन्मकुण्डली का विचार कर रहे हैं इस सम्बन्ध में भी देश-काल पात्र का विचार करके) फलादेश करना चाहिये। लग्न और चन्द्रराशि का फल प्रायः एक सा होता है। उदाहरण के लिये जैसा मेष लग्न