फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
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दसवाँ अध्याय कलत्र भाव शुभाधिपयुतेक्षिते सुतकलत्रभे लग्नतो विधोरपि तयोः शुभं त्वितरथा न सिद्धिस्तयोः। सिताद्व्ययसुखाष्टगैः खरखगैरसन्मध्यगे सितेऽप्यथ शुभेतरेक्षितयुते च जायावधः ॥१॥ दारेशे सुतगे प्रणष्टवनितोऽपुत्रोऽथवा धीश्वरो द्यूने वा निधनेश्वरोऽपि कुरुते पत्नीविनाशं ध्रुवम्। क्षीणेन्दौ सुतगे व्ययास्ततनुगैः पापैर्दारात्मजः स्त्रीसङ्गाद्धननाशनं मदगयाः स्वर्भानुभान्वोर्वदेत् ॥२॥ शुक्रे वृश्चिकगे मदे मृतवधूः कामे वृषस्थे बुधे स्त्रीनाशस्त्वथ नीचगे सुरगुरौ द्यूनाधिरूढे तथा। जामित्रे झषगे शनौ सति तथा भौमेऽथवा स्त्रीमृति-