भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

दसवां अध्याय : कलत्र भाव २१९ लग्नास्तनाथस्थितभांशकोणे नीचोच्चभे स्त्रीजननं च पत्युः । चन्द्राष्टवर्गेधिकबिन्दुराशौ कलत्रजन्मेति तथा धवस्य ॥११॥ कामस्थकामाधिपभार्गवानां मृक्षं दिशं शंसति तस्य पत्न्याः । शुक्रोऽस्तपो वा तनुनाथभांश- त्रिकोणमायाति तदा विवाहः ॥१२॥ कलत्रसंस्थस्य कलत्रदृष्टे र्दशागमेवाथ कलत्रपस्य । यदा विलग्नाधिपतिः प्रयाति कलत्रभं तत्र कलत्रलाभः ॥१३॥ कलत्रनाथस्थितभांशकेशयोः सितक्षपानायकयोर्बलीयसः । दशागमे द्यूनपयुक्तभांशक- त्रिकोणगे देवगुरौ करग्रहः ॥१४॥ कलत्रनाथे रिपुनीचसंस्थे मूढेऽथवा पापनिरोक्षिते वा कलत्रभे पापयुतेऽथ दृष्टे कलत्रहानिं प्रवदन्ति सन्तः ॥१५॥ यदि लग्न से पांचवां और सातवां स्थान शुभ ग्रह या अपने स्वामी से युत या दृष्ट हो और चन्द्रमा से पंचम तथा सप्तम स्थान अपने स्वामी या शुभ ग्रह से युत या वीक्षित (देखा जाता) हो तो पांचवें तथा