भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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दसवाँ अध्याय : कलत्र भाव २२१ शनि के वर्ग में हो या इनसे देखा जाता हो तो अपनी पत्नी के अतिरिक्त—अन्य स्त्री में रत होता है। ॥ ४ ॥ यदि शुक्र और चन्द्रमा से सप्तम मंगल और शनि हों तो स्त्री हीन हो। यदि सप्तम में नपुंसक ग्रह हो और ग्यारहवें घर में दो ग्रह हों तो जातक के दो स्त्री हों। यदि शुक्र और सप्तमेश दोनों द्वंद्व राशि और अंश में हों तो जातक के दो स्त्री हों। सप्तमेश और शुक्र जितने ग्रहों से युक्त हो उतनी ही स्त्रियों की प्राप्ति कहना।* ॥ ५ ॥ जितने ग्रह सप्तम में हों उतनी स्त्रियां होंगी यह समझना। इन ग्रहों में जितने पापग्रह हों उतनी स्त्रियाँ नष्ट होंगी और जितने शुभग्रह हों उतनी कायम रहेंगी। अब कानून द्वारा हिन्दुओं में बहु- विवाह प्रथा समाप्त हो चुकी है। अतः बहुविवाह वाला ज्योतिष का नियम लागू नहीं होगा क्योंकि ज्योतिष के सिद्धान्त देश, काल, पात्र के अनुसार लागू किये जाते हैं। यदि सप्तम भाव का स्वामी शुभग्रह हो, बलवान् हो तो उसे साध्वी और पुत्रवती स्त्री प्राप्त हो। पाप ग्रह भी सप्तम में यदि स्वगृही हो तो शुभ फल ही करता है। शुभ ग्रह (यदि वह छठे, आठवें या बारहवें का स्वामी न हो) सप्तम भाव में हो तो सुख बढ़ाता है, अर्थात् स्त्री सुख प्रदान करता है। ॥६॥ यदि द्वितीय और सप्तम स्थान अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हों तो भार्या (स्त्री) का नाश होता है। इन में भी (युत या वीक्षित में) क्रूर दृष्टि खास तौर पर अशुभ फल देने वाली होती है। इसी प्रकार पत्नी की कुण्डली में सप्तम या अष्टम अथवा दोनों भाव अशुभग्रहों से युत या वीक्षित हो तो पति के लिये अनिष्ट कहना अर्थात् दोषकारक होता *यदि अधिक ग्रहों से युत हो और उतने विवाह की संभावना न हो तो विवाह के अतिरिक्त स्त्री समागम समझना चाहिये।