फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३७ में स्थित हो और पंचम में पुरुष-ग्रह बैठे हों या पंचम को पुरुषग्रह देखते हों और पंचमेश भी पुरुष राशि, पुरुष अंश में स्थित हो तथा पुरुष-ग्रहों द्वारा देखा जाता हो या पुरुषग्रहों के साथ हो तो पुत्र होंगे। किन्तु यदि पंचम भाव में स्त्री राशि, स्त्री नवांश हो, पंचम में स्त्री ग्रह बैठे हों या स्त्री ग्रह पंचम को देखते हों और पंचमेश स्त्री-राशि, स्त्री-नवांश में स्थित हो, स्त्री-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो कन्यायें होंगी। प्रायः सब बातें किसी कुण्डली में पूर्ण रूप से घटित नहीं होतीं इसलिये मिला-जुला प्रभाव होता है। ॥ ११ ॥ बलयुक्तौ स्वगृहांशेष्वर्कसितावुपचयर्क्षगौ पुंसाम् । स्त्रीणां वा कुजचन्द्रौ यदा तदा संभवति गर्भः ॥१२॥ यदि पुरुष की कुण्डली में सूर्य और शुक्र अपने गृह और अपने अंश में बलवान् होकर उपचय स्थानों में जा रहे हों और स्त्री की कुण्डली में मंगल और चन्द्रमा अपने घर और अंश में बलवान् होकर उपचय स्थान में जा रहे हों तो गर्भ रहता है ॥ १२ ॥ अशत्रु नीचारिनवांशकैः सुते सुतेशयुक्तैरपि तैस्तथाविधैः । सुतर्क्षगैर्वा गुरुभादिनांशकात्सुते फलैः पुत्रमितिर्विचिन्त्यते ॥१३॥ इस श्लोक में यह देखना बताया गया है कि कितने पुत्र होंगे। लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ स्थान अपचय स्थान कहलाता लग्न से ३, ६, १०, ११ उपचय स्थान कहलाता है।