भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

२५२ फलदीपिका नॄणां वर्षशतं ह्यायुस्तस्मिंस्त्रेधा विभज्यते । अल्पं मध्यं दीर्घमायुरित्येतत्सर्वसम्मतम् ॥७॥ ऊपर जो दोष बताये गये हैं उनकी शान्ति के लिये प्रतिवर्ष बालक की जन्म तिथि (नक्षत्र) के दिन (चान्द्र मास के हिसाब से) जप होम आदि से शान्ति करे । ऐसा १२ वर्ष की अवस्था तक करना चाहिये । बच्चे के पिता को यह भी उचित है कि चिकित्सा तथा अन्य आयु वृद्धि के साधनों द्वारा बालक की पूरी तौर से रक्षा करे ॥ ५ ॥ जन्म से आठ वर्ष तक बालारिष्ट कहलाता है । आठ वर्ष से बीस वर्ष की अवस्था तक योगारिष्ट । बीस वर्ष से ३२ वर्ष तक अल्पायु कहलाती है । ३२ से ७० तक मध्यायु और ७० से १०० वर्ष तक पूर्णायु ।* ॥ ६ ॥ साधारणतः १०० वर्ष मनुष्य की पूर्णायु मानी गयी है । इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है । अल्पायु, मध्यायु और दीर्घायु ॥ ७ ॥ मृत्युः स्याद्दिनमृत्युरुग्विषघटीकालेऽथ तिष्येऽम्बुभे ताताम्बासुतमातुलान्पदवशात्त्वाष्ट्रे च हन्यात्तथा मूलर्क्षे पितृमातृवंशविलयं तस्यान्त्यपादे श्रियं सार्पे व्यस्तमिदं फलं न शुभसम्बन्धं विलग्नं यदि ॥८॥ यदि जन्म "दिनमृत्यु", "दिनरोग" या 'विषघटी काल' में हो तो बच्चा बहुत शीघ्र मर जावेगा ।

  • ग्रहों की ऐसी स्थिति जिससे बच्चे बीमार पड़ते हैं या बच्चों की मृत्यु हो जाती है बालारिष्ट कहलाता है । उदाहरण के लिये क्षीण चन्द्रमा का छठे, आठवें होना । तिथि, वार नक्षत्र, ग्रह आदि के कारण जो योगों से अरिष्ट होते हैं वे योगारिष्ट कहलाते हैं ।