फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २५७ अंशेशो दिवसैस्तथा यदि मृतिर्द्वित्र्यादियोगान्बहू- नालोच्य प्रवदेत्सुताष्टमगतैः पापैरिष्टं शिशोः ॥१३॥ (१) यदि लग्नेश या चन्द्रराशि का स्वामी दुर्बल होकर दुःस्थान में हो तो जिस राशि में ऐसा लग्नेश या चन्द्र राशीश पड़ा है उस राशि की संख्या के समान वर्ष तक जीता है। मेष की १, वृष की २, मिथुन की ३ इस प्रकार संख्या गिननी चाहिये। (२) यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी या चन्द्र द्रेष्काण का स्वामी दुर्बल होकर दुःस्थान में पड़ा हो तो जिस राशि में पड़ा है उस राशि की संख्या के समान महीने तक बालक जीवेगा। (३) यदि लग्न नवांश का स्वामी या चन्द्र नवांश का स्वामी दुर्बल होकर दुःस्थान में पड़ा हो तो लग्न नवांश राशि या चन्द्र नवांश राशि की जो संख्या है उतने दिन तक बालक जीता है। उपर्युक्त तीनों योगों में कौन सबसे प्रबल है यह विचार कर और यह देख कर कि लग्न से पाँचवें और आठवें कौन-कौन पाप-ग्रह बैठे हुए हैं, बालक की आयु का विचार करना चाहिये । ॥ १३ ॥ लग्नेन्द्वोस्तदधीशयोरपि मिथो लग्नेशरन्ध्रेशयो- र्द्रेष्काणात्स्वनवांशकादपि मिथस्तद्द्वादशांशात्क्रमात् । आयुर्दीर्घसमाल्पतां चरनगद्व्यङ्गैश्चरेऽथ स्थिरे ब्रूयाद्द्वन्द्वचरस्थिरैरुभयभैः स्थास्नुद्विदेहाटनैः ॥१४॥ यह देखिये कि निम्न लिखित चर है या स्थिर या द्विस्वभाव ? (क) लग्न द्रेष्काण राशि और चन्द्र द्रेष्काण राशि । यदि दोनों चर में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो दीर्घायु ? यदि दोनों स्थिर या एक चर एक द्विस्वभाव राशि में हो तो अल्पायु ।