फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७३ पक्ष का क्षीण चन्द्र पाप ग्रह के साथ हो और जल राशि* में छठे या आठवें हों तो अम्बू रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी० बी० आदि) का रोग होता है ॥ ११ ॥ जातो गच्छति येन केन मरणं वक्ष्येऽथ तत्कारणं रन्ध्रस्थैस्तदवेक्षकैर्बलवता तस्योक्तरोगैर्मृतिः । रन्ध्रक्षोक्तरुजाथवा मृतपतिप्राप्तर्क्षदोषेण वा रन्ध्रेशेन खरत्रिभागपतिना मृत्युं वदेन्निश्चितम् ॥१२॥ ग्रहेण युक्ते निधने तदुक्तरोगैर्मृतिर्वाऽथ तदीक्षकस्य ग्रहैर्विमुक्ते निधनेऽथ तस्य राशेः स्वभावोदितदोषजाता ॥१३॥ अग्न्युष्णज्वरपित्तशस्त्रजमिनश्चन्द्रो विसूच्यम्बुरु- ग्यक्ष्मादि क्षितिजोऽसृजा च दहनक्षुद्राभिचारायुधैः । पाण्ड्वादि भ्रमजं बुधो गुरुरनायासेन मृत्युं कफात् स्त्रीसङ्गोत्थरुजं कविस्तु मरुता वा संनिपातैः शनि ॥१४॥ कुष्ठेन वा कृत्रिमभक्षणाद्वा राहुर्विषाद्वाथ मसूरिकाद्यैः । कुर्याच्छिखी दुर्मरणं नराणां रिपोर्विरोधादपि कीटकाद्यैः ॥१५॥ लग्नादष्टमराशेः स्वभावदोषोद्भवं वदेन्मृत्युम् । निधनेशस्य नवांशस्थितराशिनिमित्तदोषजनितं वा ॥१६॥
- होरासार के मत से 'अलिझषमकर कुलीरा जलात्मका' अध्याय १ श्लोक ८, । कर्क, वृश्चिक, मकर और मीन जलराशि हैं ।