फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१३ (iii) (क) यदि लग्नेश और तृतीयेश का बन्ध हो और एक दूसरे की राशि में हों अर्थात् बलवान् लग्नेश तृतीय में हो और बलवान् तृतीयेश, लग्न में हो तो जातक साहस के कार्य करने वाला, धैर्यवान्, वीर और भ्रातृ प्रेमी होता है ।॥७॥ (ख) यदि तीसरे घर का मालिक बलवान् हो, सदग्रह के साथ हो और भ्रातृभाव का कारक भी बलवान् हो और शुभभाव में बैठा हो तो भाइयों की वृद्धि होती है । किन्तु यदि कारक और तीसरे घर का स्वामी निर्बल हों और दुःस्थान में बैठे हों तो भाइयों का नाश होता है ।॥८॥ (ग) यदि तीसरे घर का स्वामी और तीसरे भाव का कारक अर्थात् मंगल दोनों ऊनी राशियों में बैठे हों और बृहस्पति, सूर्य और मंगल से दृष्ट हों तथा लग्न से तीसरे घर में ऊनी राशि हो तो जितने नवांश तीसरे भाव में उदित हो चुके हों उतने ही भाई होंगे । ॥९॥ (iv) (क) यदि जन्मकुंडली में चतुर्थेश तथा चन्द्रमा दोनों दुःस्थान में हों और न वे शुभ ग्रह के साथ हों और न उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो बल्कि वे पाप ग्रहों के बीच में हों और पाप युत या पाप दृष्ट हों तो माता की शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है । किन्तु यदि सब बातें उपर्युक्त से भिन्न हों अर्थात् चतुर्थेश और और चन्द्रमा बलवान् हो, शुभ ग्रहों से युत हों, शुभ ग्रहों से दृष्ट हों और शुभ ग्रह चतुर्थ में हो तो मातृ सुख होता है। चन्द्रमा से चतुर्थ स्थानों में सौम्य ग्रह हों तो मातृ सौख्य होता है । ॥१०॥ तृतीयेश ही मंगल से देखा जा सकता है स्वयं मंगल, मंगल से नहीं देखा जा सकता है ।