भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 684 में से

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सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१९ (३) जब लग्नेश और भावेश गोचरवश एक दूसरे को देखें या एक दूसरे से युक्त हो जायें (४) जब भाव कारक गोचरवश उस स्थान पर आवे जहाँ जन्म कुण्डली में लग्नेश वा चन्द्र राशि का स्वामी हो (५) जब लग्नेश गोचरवश उस भाव में आवे- जिस भाव सम्बन्धी विचार करना हो । चन्द्रलग्न से भी इसी प्रकार विचार करना चाहिये । ॥३१॥ यद्भावेशास्थितर्क्षाशत्रिकोणस्थे गुरुर्यदा । गोचरे तस्य भावस्य फलप्राप्तिं विनिर्दिशेत् ॥३२॥ यह देखिये कि जिस भाव का विचार करना है उसका स्वामी किस राशि और किस अंश में है । जब गोचरवश बृहस्पति उस राशि और अंश से त्रिकोण में आता है तब उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होता है। ॥३२॥ लग्नारिनाथयोगे तु लग्नेशाद्दुर्बले रिपौ । तदा तद्वशगः शत्रु र्विपरीतमतोऽन्यथा ॥३३॥ जब गोचरवश लग्नेश और षष्ठेश का योग हो अर्थात् दोनों मिल तो क्या फल होगा ? यदि लग्नेश की बजाय षष्ठेश दुर्बल हो तो जातक के वश में शत्रु आ जाता है और यदि लग्नेश की बजाय षष्ठेश बली हो तो जातक स्वयं शत्रु के वश हो जाता है । ॥३३॥ यद्भावपस्य तनुपस्य भवत्यरित्वा- तत्कालशत्रु वशतोऽरिमृतिस्थितो वा । स्पर्धां तदा वदतु तेन च गोचरस्थ- स्तद्वत्सुहृत्वमपि संयुतिमैत्रतश्च ॥३४॥

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