भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 684 में से

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उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३५९ ग्रहों का फल विविध दशाओं में (यथा अष्टोत्तरी, योगिनी, काल चक्र) घटाना चाहिये—जहाँ सिद्धान्त यह है कि क्रूर ग्रह की दशा है तो क्रूर फल और शुभ ग्रह की दशा है तो शुभ फल । और जब विंशोत्तरी दशावश ग्रहों की महादशा कैसी जावेगी यह विचार करना हो तो श्लोक १८ से २६ तक वर्णित सिद्धान्त लागू करना चाहिये । (i) जब सूर्य की दशा हो तो क्रूरता से राजाओं से या युद्ध से धन प्राप्ति हो । अग्नि से और चौपायों से पीड़ा हो । आँखों में ताप (जलन) हो । पेट के तथा दांत के रोग हों । पुत्र और स्त्री को बीमारी हो या अन्य प्रकार का कष्ट हो । नौकरों का नाश हो, धन की हानि हो और गुरुजन (पिता, चाचा आदि) का वियोग या विरह हो । इस श्लोक में सूर्य की दशा का अनिष्ट फल बताया गया है । यह तभी घटित होगा जब सूर्य बिगड़ा हुआ हो । प्रत्येक ग्रह सम्बन्धी कुछ विशेष बातें हैं। जब ग्रह बिगड़ा हुआ होता है तो जिन वस्तुओं का वह अधिष्ठाता है उनसे सम्बन्धी अनिष्ट फल दिवाता है और जब ग्रह सुधरा हुआ होता है तो अपने से सम्बन्धित वस्तुओं का लाभ कराता है । ॥१८॥ (ii) चन्द्रमा की महादशा में मन्त्रों से, देवताओं से, ब्राह्मणों से तथा राजा से ऐश्वर्य प्राप्त होगा । मन्त्रों से ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो सकता है ? या तो स्वयं मन्त्रों का अनुष्ठान करे जिससे धन प्राप्ति हो या अनुष्ठान करने से दक्षिणा प्राप्त हो । चन्द्रमा की महादशा में स्त्री, धन और कृषि की भूमि प्राप्त होती है । पुष्प, वस्त्र, आभूषण, सुगन्धित पदार्थ तथा विविध प्रकार के रस प्राप्त हों । दुष्टों से विरोध हो, शरीर का या धन का क्षय हो और वातरोग हो । इस श्लोक में चन्द्रमा की महादशा के शुभाशुभ दोनों फल बताये हैं। यदि चन्द्रमा बलवान् होगा, शुभ स्थान में होगा, शुभ भवन का स्वामी होगा तो

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