फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३६१ वृद्ध स्त्री (अर्थात् जवानी जिसकी बीत चुकी है) की प्राप्ति भी हो। शनि की महादशा तो लाखों व्यक्तियों को हो जाती है किन्तु वृद्ध स्त्री की प्राप्ति तो सबको नहीं होती। यहाँ पर वृद्ध का अर्थ लेना चाहिये अधिक अवस्था वाली और जन्मकुण्डली में यदि शनि ऐसा योग करता है जिसके कारण अन्य स्त्री से संसर्ग होने की संभावना हो तभी शनि की दशा में यह योग घटित होगा। शनि की महादशा में पशु, भैंस और बैल की प्राप्ति भी होती है किन्तु जातक की स्त्री और पुत्र को पीड़ा होती है और जातक स्वयं को वातरोग (गठिया, बाय आदि), कफ रोग, गुदा रोग (बवासीर आदि) होते हैं तथा हाथ पैरों में जलन रहती है। ॥२३॥ (vii) बुध की महादशा में सदैव आचार्य सिद्धि प्राप्त हो। आचार्य सिद्धि के दो अर्थ हैं, जातक को अपने गुरुओं से सिद्धि मिले या जातक स्वयं अन्य लोगों का गुरु हो, इसप्रकार उसे सिद्धि मिले। बुध की महादशा में भी, खेत और घोड़ों का लाभ होता है और ब्राह्मणों से धन की प्राप्ति होती है। जातक को श्रेष्ठ मनुष्यों से सम्पर्क का अवसर मिले। वह देवताओं का पूजन करे और पूर्ण धन प्राप्ति हो। बुध वात, पित्त, कफ इन तीनों का ही अधिष्ठाता है, इसलिये इन त्रिदोषों में से किसी के कुपित होने से या किन्हीं दो के कारण या तीनों ही के कारण रोग हो। ॥२४॥ (viii) केतु की महादशा में बड़ा अनिष्ट फल होता है। स्त्रियों के कारण बहुत शोक और मोह हो। हृदय में बहुत दुःख का नाम शोक है। बुद्धि में विभ्रम होने का नाम मोह है। स्त्रियों तथा धनिकों के कारण जातक को पीड़ा हो या उसके अफ़सरों या मालिक से उसे पीड़ा पहुँचे। जातक से अपराध बने और उसके धन का नाश हो। अपना देश छोड़ना पड़े। कफ जनित रोगों के कारण पीड़ा हो और पैर तथा दांत में रोग हो। ॥२५॥