फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
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३६६ फलदीपिका घर में बैठे हों तो निश्चय योग देने वाला होता है। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि चतुर्थ में कर्क राशि होने के कारण यद्यपि मंगल नीच राशि का हो जावेगा किन्तु उच्च बृहस्पति के साथ बैठने से नीचत्व का दोष जाता रहेगा। और लग्नेश नवमेश दोनों एक साथ बैठकर दशम को देखेंगे, इस कारण केन्द्र में दोनो के स्थित होने से योगकारकता हुई। १२-यदि जन्म लग्न मेष हो और मंगल पांचवें घर में हो तो मंगल की महादशा में निश्चय ही योग (राज योग, अभ्युदय आदि) होता है। मेषे जातस्यहि कुजः पञ्चमस्थो भवेद्यदि। कुजदायेचसंप्राप्ते योगदश्चभवेद्ध्रुवम् ॥२॥ १३--यदि मेष लग्न हो और बृहस्पति एकादश भाव में हो तो बृहस्पति की महादशा में "अवयोग" होता है अर्थात् बृहस्पति की महादशा में विशेष उन्नति नहीं होती। बल्कि अवनति हो सकती है। १४--मेष लग्न हो और मंगल और बुध दोनों छठे घर में पड़े हों तो उनकी महादशा में फोड़े, फुन्सी, चोट, रक्त विकार आदि दोष होते हैं। यद्यपि बुध कन्या का उच्च में होगा, किन्तु लग्न और छठे घर के स्वामी का छठ घर में योग उत्तम नहीं माना गया है। १५-यदि मेष लग्न हो और मंगल तथा शुक्र तुला राशि में सातवें घर में हों तो मनुष्य अपने बाहुबल से अपनी भाग्य वृद्धि करता है और कुछ धन भी कमाता है। कहने का तात्पर्य यह है
'योग' के विरुद्ध "अवयोग" होता है। योग का अर्थ है अच्छा फल करने वाला। अवयोग का अर्थ है अच्छा फल नहीं करने वाला।