फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० फलदीपिका १४. यदि शनि लग्न में हो और दशम में चन्द्रमा हो तो राज योग होता है। १५. यदि मंगल, बुध, बृहस्पति और शनि तुला में और राहु दशम में हों तो राहु की दशा में तीर्थ-स्नान आदि शुभ फल होता है।* वृश्चिक लग्न अब वृश्चिक लग्न के कुछ योग दिये जाते हैं :— १. वृश्चिक लग्न की कुण्डली में बुध और बृहस्पति का योग हो तो विशेष धन कारक कहा गया है। २. वृश्चिक लग्न हो, बृहस्पति तृतीय हो तो जातक विशेष उदार होता है। ३. यदि सूर्य, बुध शुक्र सप्तम में हों तो बुध की महादशा में राज योग होता है और जातक का बहुत यश विस्तार होता है। ४. यदि बृहस्पति और बुध पाचवें घर में हो (मीन राशि में) और कन्या राशि का चन्द्रमा लाभ स्थान में हो तो मनुष्य बहुत धनिक और भाग्यशाली होता है। ५. यदि कर्क राशि के चन्द्र, बृहस्पति केतु नवम में हों तो केतु दशा साधारण होती है किन्तु बृहस्पति की दशा बहुत योग देने वाली होती है। *संस्कृत में 'घट' छपा है। इसका अर्थ हुआ कुंभ में मंगल, बुध, बृहस्पति तथा शनि हों और राहु दशम में हो तो तीर्थ स्नानादि शुभ फल होता है। अगर इसे 'घट' न मान कर 'धट' अर्थात् तुला मानें तो ऊपर जो अर्थ दिया है वह ठीक है।