भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९३ रन्ध्रेशायुषि शोकमोहमदमात्सर्यादिमूर्च्छोच्छ्रितिं दारिद्र्यं भ्रमणं वदेदपयशोव्याधीन्र्वजां मृतिम् ॥१८॥ पूर्वोपासितदेवकोपमशुभं जायातनूजापदं दौष्कृत्यं स्वगुरोः पितुश्च निधनं दैन्यं शुभे दुर्बले । यद्यत्कर्म करोति तत्तदफलं स्यान्मानभङ्गो नभो- भावे दुर्गुणतां प्रवासमशुभं दुर्वृत्तिमापन्नताम् ॥१९॥ श्रवणमशुभवाचां भ्रातृकष्टं सुतार्ति भवपवयसि दैन्यं वञ्चनं कर्णरोगम् । बहुरुजमपमानं बन्धनं सर्वसम्पत्- क्षयमपरशशीवाऽऽयाति रिःफेशदाये ॥२०॥ (1) यदि लग्नेश ऊपर लिखे हुये चार दोषों में से एक या अधिक दोषों से युक्त हो तो उसकी महादशा में जातक को जेल जाने का भय या अज्ञातवास का भय होता है अर्थात् उसे बंधन में रहना पड़े या ऐसी दुःस्थिति आ जावे कि छिप कर रहना पड़े; उसे निरन्तर भय रहे और आधि-व्याधि से युक्त हो । व्याधि शारीरिक रोग को कहते हैं । आधि मानसिक रोग या दुश्चिन्ताओं का नाम है । निर्बल या दुःस्थान स्थित हुए लग्नेश की दशा में जातक को मृत्यु संस्कार आदि अशुभ कार्यों में सम्मिलित होना पड़ता है । अपने ओहदे या मकान से हटना पड़ता है और निरन्तर आपत्ति ग्रस्त रहता है । (ii) यदि द्वितीयेश बिगड़ा हुआ हो तो उसकी महादशा में यदि सभा में बोलने का अवसर हो तो जड़ता हो जाये अर्थात् बोल न सके । अपनी वाणी पर कायम न रहे। उसका कुटुम्ब इधर-उधर बिखर जावे । नेत्र रोग हो । वाणी में दोष हो (मुख में शारीरिक *मूलश्लोक में केवल यह कहा है कि लग्नेश यदि दुःस्थान में हो । परन्तु ऊपर श्लोक १४ में चार दोष गिनाये गये हैं ।