भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४० फलदीपिका प्रकार सकेत मात्र से श्लोकों में बातें बतायी गई हैं । जन्मकुण्डली में या प्रश्नकुण्डली में अपनी बुद्धि से ऊहापोह द्वारा इन बताई हुई बातों का उपयोग करना चाहिये । चन्द्रमा के स्थान निम्नलिखित हैं :—दुर्गा जी का मन्दिर, जिस कमरे में स्त्री या स्त्रियां रहती हों, ऐसा स्थान जहाँ जल, औषधि (जड़ी, बूटी आदि) शहद, या शराब हो । चन्द्रमा पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशा का स्वामी है । अब मंगल के विषय में कहते हैं कि युद्ध भूमि, जहां अग्नि हो, या जहां चोर और म्लेच्छ रहते हों, इनका आधिपत्य मंगल का है। मंगल दक्षिण दिशा का स्वामी है । बुध निम्नलिखित स्थानों का अधिपति है :—जहां विष्णु मन्दिर हो, जहां विद्वान् लोग बैठते हों, आमोद-प्रमोद का स्थान, जहां ज्योतिषी या गणित कर्ता बैठते हों । बुध की दिशा उत्तर है । अब बृहस्पति के स्थान बताते हैं । खजाना, पीपल का वृक्ष, देवताओं और ब्राह्मणों के रहने का स्थान—इनका अधिपति बृहस्पति है । यह ईशान (पूर्वोत्तर) दिशा का स्वामी है । अब शुक्र के विशेष स्थान बताते हैं—वेश्याओं के घर, जहां पर्दे में स्त्रियों को रखा जाता हो, शयन स्थान, नाचने की जगह । शुक्र आग्नेय (पूर्व-दक्षिण) दिशा का स्वामी है । शनि के स्थान निम्नलिखित हैं—जहां नीची श्रेणी के लोग रहते हों, शास्ता१ का मन्दिर, अपवित्र स्थान, यह शनि के रहने के स्थान हैं। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है । अब राहु, केतु के स्थान बताते हैं । वल्मीक (दीमक के कीड़ों द्वारा बनाया हुआ जंगल में उच्च स्थान) जहां सांप रहते हों, ऐसे छिद्र जिनमें अन्धेरा हो, राहु केतु पश्चिम- दक्षिण (नैऋत्य) दिशा के स्वामी होते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ शैवो भिषङ्नृपतिरध्वरकृत्प्रधानी व्याघ्रो मृगो दिनपतेः किल चक्रवाकः शास्ताङ्गनारजककर्षकतोयगाः स्यु- रिन्दोः शशश्च हरिणश्च बकश्चकोरः ॥१७॥ १. देवता विशेष ।