भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४३२ फलदीपिका है कि जहाँ एक से अधिक पत्नियाँ होने के योग बताए गये हैं वहाँ एक से अधिक पति होने का योग केवल उसी समाज की स्त्रियों को लागू होगा जिसमें बहु विवाह (जैसे पर्वतीय प्रदेशों में एक स्त्री के कई पति होते हैं) या जहाँ विधवा विवाह होता है वहीं लागू होगा। हिन्दू पुरुषों की कुण्डली में भी (अब एक पत्नी के रहते हुये पुरुष दूसरा विवाह नहीं कर सकता इस कारण) बहुत से योग अब लागू नहीं होंगे और बहुत सी जगह जहाँ बहुविवाह के योग दिये गये हैं विवाह न होकर एक से अधिक स्त्री से जातक का सम्बन्ध हो ऐसा योग घटित हो सकता है। प्राचीन ग्रन्थों में लिखे हुये फल, देश, काल, पात्र भेद से बदलते रहते हैं। १. यदि सातवें घर का मालिक शुक्र के साथ हो और क्रूर

  • सम्बन्ध से रहित हो (सम्बन्ध चार प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का एक साथ बैठना, एक-दूसरे की राशि में बैठना, एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखना, किसी ग्रह की राशि में बैठ कर उस ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखना) तो एक ही स्त्री होती है। २. यदि सातवें घर का मालिक पाप ग्रह से सम्बन्ध करे या दूसरे या सातवें घर में पाप ग्रह हों, या शुक्र लाभ में हो या नीच का हो या सातवें घर का मालिक छठे या बारहवें हों तो दूसरा विवाह होता है। ३. यदि लग्न में पाप ग्रह हो तो दूसरा विवाह हो। ४. यदि मंगल और शुक्र एक साथ दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें घर में बैठे हों और शुक्र कमजोर हो तो द्वितीय विवाह हो। ५. यदि मंगल दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें हो तो भी दो विवाह होते हैं। अन्य शास्त्रों में इसे मंगलीक दोष कहा गया है। इसलिए यदि जातक की स्त्री भी मंगलीक हो तो वह ज़िन्दा रहेगी और