भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 684 में से

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पृष्ठ 438

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३७ १३. यदि तुला का सूर्य हो तो जातक के पिता की भाग्य हानि होता है। १४. यदि जातक धनु लग्न हो तो जातक का अपने पिता के जरिये भाग्य उदय होगा। या जातक के पिता का भाग्य उदय होगा। चाहे तुला का सूर्य हो इस योग में फर्क नहीं होता। १५. यदि (i) सूर्य और नवें का मालिक और बारहवें का मालिक यह तीनों बारहवें घर में हों या (ii) बृहस्पति और बारहवें घर के मालिक बारहवें घर में हों तो जातक के पिता का भाग्य उदय होता है। १६. यदि बारहवें घर में शुक्र हो तो कलत्र भाग्य अर्थात् अपनी पत्नी के कारण भाग्य उदय होता है। १७. यदि चन्द्रमा बारहवें घर में हो तो माता के कारण भाग्य उदय होता है। १८. यदि मंगल बारहवें हो तो भ्रातृ भाग्य (भाइयों के सम्बन्ध में भाग्यशाली या भाई के कारण भाग्य उदय)। १९. यदि नवें घर का मालिक बारहवें घर में हो तो पिता का भाग्य उदय या पिता के कारण जातक का स्वयं का भाग्य उदय होता है। २० यदि नवें घर का मालिक सातवें में हो और सातवें घर का मालिक नवम में हो तो अपनी पत्नी के कारण भाग्य उदय होता है। २१. यदि दूसरे घर के मालिक और बुध छठें में बैठे हों तो जाति वालों का (चचेरे भाई आदि सम्बन्धी का) धन प्राप्त होता है। २२. यदि केवल बुध छठे हो तो भी यही फल है। २३. यदि पाँचवें घर का मालिक और बृहस्पति दोनों अपनी अपनी उच्च राशि में हो तो उसके बच्चे भाग्यशाली होते हैं।

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