भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 684 में से

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४४४ फलदीपिका १२. जो भाव, भावेश या कारक पाप ग्रहों के मध्य में हो वह भाव, भावेश या कारक दुःखदायक होता है । १३. यदि ग्यारहवें और बारहवें भावों के स्वामियों का सम्बन्ध हो तो योग प्रद होता है । १४. ग्यारहवें घर का स्वामी यदि तीसरे घर या बारहवें घर में हो तो योग प्रद होता है । १५. कोई भी लग्न हो, यदि भाग्येश (नवें घर का मालिक) आठवें घर में हो तो योग प्राप्त नहीं होता, जातक सामान्य स्थिति में रहता है । १६. यदि चन्द्रमा छठे हो तो जातक की बुद्धि कुशल होती है । यदि द्वितीय में हो तो उसके नेत्र चंचल हों । ग्रह मालिका योग १. यदि नौ ग्रह लग्न से नवम भाव तक, प्रत्येक भाव में एक ग्रह हो तो मालिका योग होता है । २. यदि लग्न से छठे स्थान तक सब ग्रह हों तो “षष्टखेट मालिका” योग होता है । ३. यदि लग्न से सातवें घर तक—सातों भावों में सब ग्रह प्रत्येक भाव में कोई ग्रह होना चाहिये—तो मालिका योग होता है । ४. यदि सब ग्रह लग्न से अष्टम भाव तक (प्रत्येक भाव में ग्रह होना चाहिये) हों तो हो “अष्ट खेचर माला योग” होता है । ५. बहुत से जपोतिषियों की राय है कि सूय राशि से प्रारंभ- मालिका योग उत्तम योग है ।

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